*कुलं पवित्रं जननी कृतार्था, वसुन्धरा पुण्यवती च तेन ।**अपारसंवित्सुखसागरेऽस्मिन् ,लीनं परे ----:
atmvigyan atmgyan
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*कुलं पवित्रं जननी कृतार्था, वसुन्धरा पुण्यवती च तेन ।**अपारसंवित्सुखसागरेऽस्मिन् ,लीनं परे ----:
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कुलं पवित्रं जननी कृतार्था, वसुन्धरा पुण्यवती च तेन ।
*अपारसंवित्सुखसागरेऽस्मिन् , लीनं परे ब्रह्मणि यस्य चेत: ॥
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कहते है -मातृ ऋण सबसे बड़ा होता है, उससे मुक्त नही हुवा जा सकता ! -
-----लेकिन ,यदि उस माँ के गर्भ से कोई ऐसा सन्तान जन्म ले ले जो पूर्ण ब्रह्म को प्राप्त हो जाय ,तो उसका वह कुल पवित्र हो जाता है, जिस माता के गर्भ से उनका जन्म होता है ,वह भाग्यवती जननी कृतार्थ हो जाती है अर्थात मुक्त हो जाती है, क्योकि उसका वह सन्तान पूर्ण ब्रह्म को प्राप्त होने से पुन: माँ के गर्भ में नही आता अर्थात उनका पुन:जन्म नही होता , जिससे वह मातृ ऋण से उऋण हो जाता है ! वह जननी कुछ भी न करते हुवे भी मुक्त-कृतार्थ हो जाती है !
---- जहाँ ऐसे पूर्ण ब्रह्म को प्राप्त ब्रह्म -वेत्ता का चरणरज पड़ती है वह वसुन्धरा भी पुण्यवती हो जाती है।
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बहूनां जन्मनामन्ते ज्ञानवान्मां प्रपद्यते।
वासुदेवः सर्वमिति स महात्मा सुदुर्लभः।।
बहुत जन्मो के अंत के जन्म में तत्व ज्ञान [पूर्णता ] को प्राप्त ,सभी वासुदेव ही है ऐसा जानता है ,ऐसा तत्वदर्शी महात्मा सुदुर्लभ कहा गया है !