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श्री गीता ज्ञान यज्ञ भाग 43**11वां अध्याय विश्वरूप दर्शन* *(शरणागति) भाग ७*‪@bhaktimeshakti2281‬

Bhakti me Shakti

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श्री गीता ज्ञान यज्ञ भाग 43**11वां अध्याय विश्वरूप दर्शन* *(शरणागति) भाग ७*‪@bhaktimeshakti2281‬

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Ram bhakti ‪@bhaktimeshakti2281‬ परम पूज्य डॉक्टर श्री विश्वामित्र जी महाराज जी के मुखारविंद से ((2083)) धुन: बाबा मेरी बांह पकड़ना, बाबा मेरी रक्षा करना, बाबा मुझे भक्ति देना, बाबा मेरी बांह पकड़ना । बाबा मुझे दर्शन देना बाबा मेरी रक्षा करना बाबा मुझे भक्ति देना बाबा मुझे दर्शन देना । प्रभु जी तुम बड़े प्यारे हो, प्रभु जी तुम ही तो हमारे हो प्रभु जी तुम बड़े प्यारे हो, प्रभु जी तुम ही तो हमारे हो ।। श्री गीता ज्ञान यज्ञ भाग 43 11वां अध्याय विश्वरूप दर्शन (शरणागति) भाग ७ भक्तजनों अमृतवाणी पुस्तक आप इसीलिए अपने हाथ में रखते हैं, इसे देखकर पढ़ें । जिनको इधर-उधर देखने की बुरी आदत है, उनकी यह आदत छूटे । इधर-उधर देखने वाले कभी एकाग्र चित्त नहीं हो सकेंगे, कभी उनका मन एकाग्र नहीं हो सकेगा । कितना आसान साधन है, आपने सामने पुस्तक रखी हुई है । उसे देख देख कर 35 मिनट के लिए आप एकाग्र मन रहते हैं । यह कोई छोटी बात नहीं । मेहरबानी करके पुस्तक की और ही देखा कीजिएगा, इधर-उधर देखने की आवश्यकता नहीं । यह कोई बुद्धिमता नहीं, यह कोई भलाई का काम नहीं । चर्चा चल रही थी बिन शरणागति, बिन पूर्ण समर्पण, किसी को भी शांति नहीं मिल सकती । समर्पण, शरणागति, अर्थात परमात्मा की परम इच्छा को सहर्ष शिरोधार्य करना । जीवन में अशांति है तनिक भी, तो समझ लेना चाहिए कि अभी परमेश्वर की इच्छा के अनुसार चलना नहीं सीखा । अभी अपनी इच्छा है, जो हम परमात्मा से मनवाना चाहते हैं । तो यह शांति इच्छा देगी यह तनाव, उदासी, दुख देने वाली चीज । हां, आप परमात्मा से प्रार्थना कर सकते हैं। लेकिन यह अपेक्षा की आपकी इच्छा के अनुसार ही परमात्मा करें, यह दुखदाई है। यह आपको उदासी देगी, तनाव देगी । जैसा हम चाहते हैं, वैसा ही हो, जो हम चाहते हैं वैसा ही हो, यह अपनी इच्छा मनवाने के ढंग। ऐसा व्यक्ति शरणागत नहीं कहा जाता, समर्पित नहीं कहा जाता । सदा अशांत रहेगा, दुखी रहेगा, उदास रहेगा, उसके मन की नहीं हो रही । उसने परमात्मा की इच्छा के अनुसार चलना सीखा नहीं अभी तक । परमात्मा की इच्छा को सहर्ष शिरोधार्य करना अभी तक सीखा नहीं । मानो सात्विक नहीं हुआ है वह । वह अभी परमात्मा के शरणागत नहीं हुआ है । जब यह कहा जाता है, कि अमुक व्यक्ति समर्पित हो गया हुआ है, शरणागत हो गया है, तो इसका अर्थ यह मानिएगा कि आज के बाद उसकी अपनी इच्छा कोई नहीं रही । उसकी सारी की सारी इच्छाएं वही इच्छाएं हैं, जो परमात्मा की इच्छाएं हैं । सुनने में बहुत आसान लगता है, लेकिन करने में बहुत कठिन है । जो कर गया वह बिल्कुल ऐसा हो गया, जैसे बूंद यहां नदी सागर में प्रविष्ट करके तो सागर बन जाती है । उसका अपना चिन्ह, उसका अपना अस्तित्व खत्म हो जाता है । अपने इस चिह्न को, अपने अस्तित्व को खत्म करना ही समर्पण कहा जाता है । अस्तित्व क्या है ? इच्छाओं का पुंज । जब अपनी इच्छा कोई नहीं रही, एक परमात्मा की इच्छा ही कार्यरत है, सत्य भी यही है । अशांति क्यों मिलती है ? इसलिए कि आप सत्य के समीप कम है। जैसे-जैसे आप सत्य के समीप जाते हैं, तो आपको शांति, परम शांति, परमानंद की प्राप्ति होने लग जाती है । जितना सत्य से दूर, उतना असत्य के पास । उतना दुख, उतनी अशांति, उतना तनाव, यह सब कुछ बना रहेगा । कुल्लू से ऊपर आप जैसे ही निकलते हैं मनाली की तरफ, तो आपको नीचे में और ऊपर में अंतर दिखाई देना शुरू हो जाता है। यहां ठंडक शुरू हो जाती है । और ऊपर की ओर जाएं तो और अधिक ठंडक महसूस होने लग जाती है । जैसे-जैसे आप सत्य के निकट, निकटतर, निकटतम होते जाते हैं, तैसे तैसे आपके जीवन में शांति, परम शांति, परमसुख एवं परमानंद की प्राप्ति के चिन्ह प्रत्यक्ष प्रकट होने शुरू हो जाते हैं