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तिष्यगुप्त की भूल और आचार्य आषाढ़ का अव्यक्तवाद | जीव का स्वरूप और संका दोष | गुरु कृपा वाणी

Guru Krupa Vaani | गुरु कृपा वाणी

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तिष्यगुप्त की भूल और आचार्य आषाढ़ का अव्यक्तवाद | जीव का स्वरूप और संका दोष | गुरु कृपा वाणी

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गुरु कृपा वाणी — एपिसोड 35 नमो अरिहंताणं। नमो सिद्धाणं। नमो आयरियाणं। नमो उवज्झायाणं। नमो लोए सव्व साहूणं। 🙏 इस एपिसोड में हम दो महत्वपूर्ण प्रसंगों को सरल और विस्तारपूर्वक समझेंगे— 🔹 तिष्यगुप्त की जीव-प्रादेशिक दृष्टि तिष्यगुप्त ने जीव के प्रदेशों का अध्ययन करते हुए यह मान लिया कि जीव का केवल अंतिम अर्थात् चरम प्रदेश ही वास्तविक जीव है। आचार्य वसु ने उन्हें समझाने का प्रयास किया, लेकिन वे अपनी धारणा पर दृढ़ रहे। बाद में एक श्रावक द्वारा दिए गए केवल एक भोजन-कण के माध्यम से उन्हें अपनी धारणा की तार्किक भूल का अनुभव हुआ। इस प्रसंग के माध्यम से हम समझेंगे कि— जीव के प्रदेशों का वास्तविक स्वरूप क्या है? क्या केवल एक प्रदेश को पूर्ण जीव कहा जा सकता है? कपड़े और तंतु का उदाहरण इस बात को कैसे स्पष्ट करता है? “गाँव जल गया” जैसे व्यवहारिक प्रयोगों का वास्तविक अर्थ क्या है? और तिष्यगुप्त को अपनी भूल का बोध कैसे हुआ? 🔹 आचार्य आषाढ़ का अव्यक्तवाद दूसरे प्रसंग में आचार्य आषाढ़ की अद्भुत घटना आती है। उनके देहांत के बाद उनका जीव देवगति में उत्पन्न हुआ और वे अपने पुराने शरीर में वापस आए, जिससे साधुओं के मन में गहरा संशय उत्पन्न हुआ। इसके बाद साधुओं ने सोचना शुरू किया कि— “जिसे हम साधु समझ रहे हैं, क्या वह वास्तव में साधु है?” धीरे-धीरे यह संशय इतना बढ़ गया कि वे एक-दूसरे के साधुत्व पर भी विश्वास नहीं करने लगे। तब राजा बलभद्र ने एक अत्यंत प्रभावशाली युक्ति द्वारा उन्हें समझाया कि यदि अपने साधुत्व के विषय में स्वयं उन्हें कोई संदेह नहीं है, तो दूसरों के साधुत्व पर अनंत संशय करना उचित नहीं है। इस प्रसंग से हम समझेंगे— अत्यधिक संशय क्यों उचित नहीं है? साधु के साधुत्व का निश्चायक लक्षण क्या है? निश्चय और व्यवहार—दोनों नयों का महत्व क्या है? और धर्म के व्यवहार को चलाने के लिए प्रमाण एवं उचित लक्षणों पर विश्वास क्यों आवश्यक है? दोनों प्रसंग हमें एक महत्वपूर्ण सीख देते हैं— शास्त्र को किसी एक शब्द, एक वाक्य या एक घटना के आधार पर नहीं, बल्कि उसके समग्र अर्थ, तर्क और व्यवहार के साथ समझना चाहिए। 🙏 जय जिनेन्द्र।