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माँ कूष्मांडा (नवरात्रि का चौथा दिन) की कथा

Atharvaveda -- अथर्ववेद

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माँ कूष्मांडा (नवरात्रि का चौथा दिन) की कथा

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Atharvaveda -- अथर्ववेद
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माता कूष्मांडा हिंदू धर्म में मां दुर्गा का चौथा स्वरूप हैं, जिनकी पूजा नवरात्रि के चौथे दिन की जाती है। मुख्य विवरण • उत्पत्ति और अर्थ: 'कूष्मांडा' शब्द तीन शब्दों से मिलकर बना है— 'कु' (थोड़ा/छोटा), 'ऊष्मा' (गर्मी/ऊर्जा) और 'अंड' (ब्रह्मांड या अंडा)। जब सृष्टि में अंधकार था, तब मां ने अपनी मंद मुस्कान से इस ब्रह्मांड (ब्रह्मांडीय अंडे) की रचना की थी। • निवास: मां कूष्मांडा का वास सूर्यमंडल के भीतर और उसके केंद्र में माना जाता है। सूर्य को ऊर्जा देने की शक्ति उन्हीं से प्राप्त होती है। • स्वरूप (अष्टभुजा): मां की आठ भुजाएं हैं, इसलिए इन्हें अष्टभुजा देवी भी कहा जाता है। • हाथों में धारण वस्तुएं: इनके हाथों में कमंडल, धनुष, बाण, कमल का पुष्प, अमृत से भरा कलश, चक्र, गदा और आठवें हाथ में जप की माला सुशोभित होती है। • वाहन: इनका वाहन सिंह (शेर) है। • प्रिय भोग: माता को कुम्हड़े (कद्दू) की बलि और भोग अत्यंत प्रिय है। इसके अलावा मालपुआ, पेठा या बताशा भी अर्पित किया जाता है। • महत्व और फल: इनकी उपासना से भक्तों के समस्त रोग, शोक और कष्ट दूर होते हैं तथा आयु, यश, बल और आरोग्य की प्राप्ति होती है।