" प्रण करना है सहज, कठिन है लेकिन, उसे निभाना " 🔥 | Rashmirathi
SHEKHAR SUMAN
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" प्रण करना है सहज, कठिन है लेकिन, उसे निभाना " 🔥 | Rashmirathi
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SHEKHAR SUMAN
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"करने लगे मोह प्राणों का तो फिर प्रण लेना क्या?" 🔥
Welcome to a deeply philosophical recitation from Ramdhari Singh 'Dinkar's immortal epic, Rashmirathi.
These verses explore the harsh reality of life and destiny. Dinkar Ji beautifully explains how making a promise is easy, but fulfilling it demands absolutely everything. It is a tribute to Karna (Radheya), the ultimate symbol of friendship, who proved that true immortality and glory are earned only by those who boldly walk into the fire of their own promises without fearing for their lives.
📜 A glimpse of the verses recited:
प्रेमयज्ञ अति कठिन, कुण्ड में कौन वीर बलि देगा?
तन, मन, धन, सर्वस्व होम कर अतुलनीय यश लेगा?
हरि के सन्मुख भी न हार जिसकी निष्ठा ने मानी,
धन्य-धन्य राधेय! बन्धुता के अद्भुत अभिमानी।
पर जाने क्यों, नियम एक अद्भुत जग में चलता है,
भोगी सुख भोगता, तपस्वी और अधिक जलता है।
हरिआली है जहाँ, जलद भी उसी खण्ड के वासी,
मरु की भूमि मगर, रह जाती है प्यासी की प्यासी।
और, वीर जो किसी प्रतिज्ञा पर आकर अड़ता है,
सचमुच, उसके लिए उसे सब-कुछ देना पड़ता है।
नहीं सदा भीषिका दौड़ती द्वार पाप का पाकर,
दु:ख भोगता कभी पुण्य को भी मनुष्य अपनाकर।
पर, तब भी रेखा प्रकाश की जहाँ कहीं हँसती है,
वहाँ किसी प्रज्वलित वीर नर की आभा बसती है।
जिसने छोड़ी नहीं लीक विपदाओं से घबराकर,
दी जग को रोशनी टेक पर अपनी जान गँवाकर।
नरता का आदर्श तपस्या के भीतर पलता है,
देता वही प्रकाश, आग में, जो अभीत जलता है।
आजीवन झेलते दाह का दंश वीर-व्रतधारी,
हो पाते तब कहीं अमरता के पद के अधिकारी।
प्रण करना है सहज, कठिन है लेकिन, उसे निभाना,
सबसे बड़ी जाँच है व्रत का अन्तिम मोल चुकाना।
अन्तिम मूल्य न दिया अगर, तो और मूल्य देना क्या?
करने लगे मोह प्राणों का तो फिर प्रण लेना क्या?
सस्ती कीमत पर बिकती रहती जबतक कुर्बानी,
तबतक सभी बने रह सकते हैं त्यागी, बलिदानी।
पर, महँगी में मोल तपस्या का देना दुष्कर है,
हँस कर दे यह मूल्य, न मिलता वह मनुष्य घर-घर है।
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