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"किस्मत का पाशा पौरुष से हार पलट जाता है!" 🔥 | Karna Defeats Destiny | Rashmirathi Canto 4

SHEKHAR SUMAN

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"किस्मत का पाशा पौरुष से हार पलट जाता है!" 🔥 | Karna Defeats Destiny | Rashmirathi Canto 4

31 просмотр · 3 недели назад
SHEKHAR SUMAN
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"महाराज, उद्यम से विधि का अंक उलट जाता है, किस्मत का पाशा पौरुष से हार पलट जाता है..." 🔥 Welcome to another thrilling and deeply emotional segment from Ramdhari Singh 'Dinkar's Rashmirathi (Canto 4). In these verses, Karna expresses the purest form of charity. He finds his life's meaning in the tear-filled, grateful eyes of the poor, declaring he would happily die if his death gave life to another. Suddenly, Lord Indra, disguised as a Brahmin, steps out from the shadows. He praises Karna but tries to shake his confidence, arguing that "Destiny" limits how much a poor man can receive, no matter how great the giver is. Karna’s reply is legendary. He dismisses the fear of fate, roaring that relentless hard work (Paurush) and courage can rewrite destiny itself. He boldly challenges the disguised Brahmin to drop the hesitation and ask for absolutely anything. 📜 Verses recited in this video: पर का दुःख हरण करने में ही अपना सुख माना, भग्यहीन मैने जीवन में और स्वाद क्या जाना? आओ, उऋण बनूँ तुमको भी न्यास तुम्हारा देकर, उपकृत करो मुझे, अपनी संचित निधि मुझसे लेकर। अरे, कौन हैं भिक्षु यहाँ पर? और कौन दाता है? अपना ही अधिकार मनुज नाना विधि से पाता है। कर पसार कर जब भी तुम मुझसे कुछ ले लेते हो, तृप्त भाव से हेर मुझे क्या चीज नहीं देते हो? दीनों का संतोष, भाग्यहीनों की गदगद वाणी, नयन कोर मे भरा लबालब कृतज्ञता का पानी। हो जाना फिर हरा युगों से मुरझाए अधरों का, पाना आशीर्वचन, प्रेम, विश्वास अनेक नरों का। इससे बढ़कर और प्राप्ति क्या जिस पर गर्व करूँ मैं? पर को जीवन मिले अगर तो हँस कर क्यों न मरूं मैं? मोल-तोल कुछ नहीं, माँग लो जो कुछ तुम्हें सुहाए, मुँहमाँगा ही दान सभी को हम हैं देते आएँ।” गिरा गहन सुन चकित और मन-ही-मन-कुछ भरमाया, लता-ओट से एक विप्र सामने कर्ण के आया। कहा कि “जय हो, हमने भी है सुनी सुकीर्ति-कहानी, नहीं आज कोई त्रिलोक में कहीं आप-सा दानी। नहीं फिराते एक बार जो कुछ मुख से कहते हैं, प्रण पालन के लिए आप बहु भाँति कष्ट सहते हैं। आश्वासन से ही अभीत हो सुख विपन्न पाता है, कर्ण-वचन सर्वत्र कार्यवाचक माना जाता है। लोग दिव्य शत-शत प्रमाण निष्ठा के बतलाते हैं, शिवि-दधिचि-प्रह्लाद-कोटि में आप गिने जाते हैं। सबका है विश्वास, मृत्यु से आप न डर सकते हैं, हँस कर प्रण के लिए प्राण न्योछावर कर सकते हैं। ऐसा है तो मनुज-लोक, निश्चय, आदर पाएगा, स्वर्ग किसी दिन भीख माँगने मिट्टी पर आएगा। किंतु, भाग्य है बली, कौन, किससे, कितना पाता है, यह लेखा नर के ललाट में ही देखा जाता है। क्षुद्र पात्र हो मग्न कूप में जितना जल लेता है, उससे अधिक वारि सागर भी उसे नहीं देता है। अतः, व्यर्थ है देख बड़ों को बड़ी वास्तु की आशा, किस्मत भी चाहिए, नहीं केवल ऊँची अभिलाषा।” कहा कर्ण ने: “वृथा भाग्य से आप डरे जाते हैं, जो है सम्मुख खड़ा, उसे पहचान नहीं पाते हैं। विधि ने क्या था लिखा भाग्य में, खूब जानता हूँ मैं, बाहों को, पर, कहीं भाग्य से बली मानता हूँ मैं। महाराज, उद्यम से विधि का अंक उलट जाता है, किस्मत का पाशा पौरुष से हार पलट जाता है। और उच्च अभिलाषाएँ तो मनुज मात्र का बल हैं, जगा-जगा कर हमें वही तो रखती निज चंचल हैं। आगे जिसकी नजर नहीं, वह भला कहाँ जाएगा? अधिक नहीं चाहता, पुरुष वह कितना धन पाएगा? अच्छा, अब उपचार छोड़, बोलिए, आप क्या लेंगे, सत्य मानिये, जो माँगेंगें आप, वही हम देंगे। #Rashmirathi #Karna #Destiny #RamdhariSinghDinkar #HindiPoetry #Mahabharata #DinkarKavita #poemrecitation