The history of swarnagiri fort Jalore ||स्वर्णगिरि दुर्ग जालोर का इतिहास || jalore Killa
Bsrajpurohit
0:00 / 0:00
The history of swarnagiri fort Jalore ||स्वर्णगिरि दुर्ग जालोर का इतिहास || jalore Killa
5 558 просмотров · 2 года назад
Bsrajpurohit
3,67 тыс. подписчиков
5 558 просмотров · 2 года назад
4.8 view
जालौर दुर्ग पर विभिन्न कालों में गुर्जर प्रतिहार, परमार, चालुक्य, चौहान, राठौर, इत्यादि राजवंशों ने शासन किया [1] । किले पर परमार कालीन कीर्ती स्तम्भ कला का उत्कृष्ट नमूना है, दुर्ग का निर्माण परिहार राजाओं ने 8वीं शताब्दी में करवाया था।
जालौर दुर्ग
कान्हड़देव चौहान के शासनकाल में यहाँ दिल्ली के सुल्तान अलाउद्दीन खिलजी ने 1311 ई. आक्रमण किया था ।
जालौर के किले का तोपखाना बहुत आकर्षक है। इसके विषय में कहा जाता है कि यह यदुकुल राजा भोज द्वारा निर्मित संस्कृत पाठशाला थी, जो कालान्तर में दुर्ग के मुस्लिम अधिपतियों द्वारा मस्जिद परिवर्तित कर दी गयी तथा तोपखाना मस्जिद कहलाने लगी। तथा यह एक जल दुर्ग हैं। 1956[2] में यह दुर्ग संरक्षित स्मारक की श्रेणी में रखा गया।स्वर्णगिरि के आसपास का जालौर जिला अब अरब सागर के रेगिस्तानी तट पर है। यह धूप में नहाने वाली मछली की तरह दिखती है जिसने अपना चेहरा समुद्र में डाल दिया है। आपने सदियों से बहता हुआ सागर, उसके पीछे दलदल का असीम विस्तार रखा है। जिसे आज नेहद के नाम से जाना जाता है उसे छोड़ दिया है। महर्षि जाबालि ऋषि का निवास स्थान होने के कारण मुख्य नगर का नाम जाबालीपुर पड़ा। और बाद में जालौर की स्थापना हुई, जो आज जिला मुख्यालय के नाम से जाना जाता है। स्वतंत्रता से पहले, वर्तमान जिला जोधपुर (मारवाड़) की तत्कालीन रियासत का एक हिस्सा था। 30 मार्च, 1949 को राजस्थान के गठन के समय जोधपुर रियासत के साथ, यह राजस्थान राज्य में विलय हो गया और जोधपुर संभाग का हिस्सा बन गया। जब विभिन्न जिलों का निर्माण हुआ तो वर्तमान जालौर जिला अस्तित्व में आया।
जिला स्थल में पर्यटन और दर्शनीय स्थल -जालोर जिले में राज्य; पुरातत्व विभाग के अंतर्गत तीन प्रमुख स्थानों में जालोर, ऐतिहासिक दूरी पर स्थित है जो 1200 फुट ऊंची पहाड़ी पर स्थित है जबकि दूसरे स्थान पर नूर का तोपखाना के नाम से विख्यात इस परमार राजा भोज ने अपने शासन काल में इसे 8वीं शताब्दी के काल में बनवाया था। अरावली के एक प्रमुख धार्मिक स्थल के रूप में पर्वत श्रंखला में सूर्य/आ पर्वत पर मां चामुदा का मंदिर तथा जालोर में कनकलच पर्वत पर सीरे का मंदिर प्रमुख है।जालौर किले का इतिहास के बारे में बात करें तो बता दें कि इस किले का वास्तविक निर्माण समय आज तक अज्ञात है, हालांकि ऐसा माना जाता है कि किले का निर्माण 8 वीं -10 वीं शताब्दी के बीच हुआ था। 10 वीं शताब्दी में जालौर शहर परमार राजपूतों द्वारा शासित था। जालौर का किला 10 वीं शताब्दी का फिला है और "मारू" (रेगिस्तान) के नौ महल में से एक है जो परमार वंश के अधीन था। 1311 में दिल्ली के सुल्तान लाउद्दीन खिलजी ने किले पर हमला किया और इसे नष्ट कर दिया था। किले के खंडहर पर्यटकों के प्रमुख आकर्षण हैं, जो ारत के इतिहास के बारे में और भी ज्यादा जानने के लिए यहां आते हैं।जालौर किले का इतिहास के बारे में बात करें तो बता दें कि इस किले का वास्तविक निर्माण समय आज तक अज्ञात है, हालांकि ऐसा माना जाता है कि किले का निर्माण 8 वीं -10 वीं शताब्दी के बीच हुआ था। 10 वीं शताब्दी में जालौर शहर परमार राजपूतों द्वारा शासित था। जालौर का किला 10 वीं शताब्दी का किला है और "मारू" (रेगिस्तान) के नौ महल में से एक है जो परमार वंश के अधीन था। 1311 में दिल्ली के सुल्तान अलाउद्दीन खिलजी ने किले पर हमला किया और इसे नष्ट कर दिया था। किले के खंडहर पर्यटकों के प्रमुख आकर्षण हैं, जो भारत के इतिहास के बारे में और भी ज्यादा जानने के लिए "हांजालौर किले पर जब अला उद दीन खिलजी ने हमला किया तो कई राजपूत सैनिकों ने शहादत प्राप्त की, तो इसके बाद उनकी पत्नियों ने जलती हुई आग के एक तालाब में कूदकर खुद को जला दिया।
बता दें कि यह राजपूत महिलाओं के बीच सर्वोच्च बलिदान की एक लोकप्रिय परंपरा थी और इसे "जौहर" कहा जाता था।
जालौर किले का मुख्य आकर्षण (अल ऊद दीन खिलजी द्वारा) रिहायशी महल है।
• कई हिंदू मंदिर, मस्जिद और जैन मंदिर आप किले परिसर के अंदर देख सकते हैं।अगर आप जालौर किला घूमने जाने के बारे विचार कर रहें हैं तो बता दें कि यहां की यात्रा करने का सबसे अच्छा समय अक्टूबर से मार्च तक होता है। इन महीनों के दौरान राजस्थान का मौसम काफी ठंडा होता है। मार्च से जून तक यहां पर गर्मियों का मौसम होता है। रेगिस्तानी क्षेत्र में स्थित होने की वजह से जालौर किले की यात्रा गर्मियों में नहीं करना चाहिए। बारिश के मौसम में यहां की यात्रा करना सही नहीं है क्योंकि ज्यादा बारिश आपकी यात्रा का मजा किरकिरा कर सकती है।तोपखाना जालौर शहर के मध्य में स्थित है जो पर्यटकों के आकर्षण का प्रमुख केंद्र भी है। यह तोपखाना कभी एक भव्य स्कृत विद्यालय था जिसे राजा भोज ने 7 वीं और 8 वीं शताब्दी के बीच बनवाया था। राजा भोज एक बहुत बड़े संस्कृत एक विद्वान थे और उन्होंने शिक्षा प्रदान करने के लिए अजमेर और धार में कई समान स्कूल बनाए हैं। देश के स्वतंत्र गने से पहले जब अधिकारियों इस स्कूल का इतेमाल गोला बारूद के भंडारण के उपयोग किया था तो इसका नाम तोपखाना रख दिया गया था। आज भले ही इस स्कूल की इमारत काफी अस्त-व्यस्त हो चुकी है लेकिन इसके बाद भी यह आज भी काफी प्रभावशाली है।
तोपखाना की पत्थर की नक्काशी पर्यटकों को बेहद आकर्षित करती हैं। यहां इसके दोनों तरफ दो मंदिर भी स्थित हैं लेकिन इन मंदिरों में कोई मूर्ति नहीं है। टोपेखाना की सबसे संरचना जमीन से 10 फ़ीट ऊपर बना एक कमरा है जहां जाने के लिए सीढ़ी लगाईं गई है। इस कमरे के बारे में ऐसा माना जाता है कि यह स्कूल के प्रधानाध्यापक का निवास स्थान था। अगर कोई भी पर्यटक जालौर की यात्रा करने जा रहा है तो उसको इस
ऐतिहासिक स्थल की यात्रा जरुर करनी चाहिए।जालौर वन्यजीव अभयारण्य भारत में एकमात्र प्राइवेट अभयारण्य है
Jalore food location 👇
https://maps.app.goo.gl/4tUMAKm7S5nYp...
The history of swarnagiri fort Jalore ||स्वर्णगिरि दुर्ग जालोर का