गुरु ने जो पाया मुक्तहस्त लुटाया उनके नाम पर दीवारें नहीं, संघ को मजबूत करे युवाचार्य महेन्द्र ऋषिजी
AnandMahendraVani и CHAPLOT MEDIA CONCEPT
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गुरु ने जो पाया मुक्तहस्त लुटाया उनके नाम पर दीवारें नहीं, संघ को मजबूत करे युवाचार्य महेन्द्र ऋषिजी
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📿 आनंद अनुभूति वर्षावास — भीलवाड़ा 2026
🌼 महापुरुष जन्म जयंती विशेष गुणगान
📅 26 अगस्त 2026, बुधवार
📍 शांतिभवन, भीलवाड़ा
श्रमणसंघीय युवाचार्य प्रवर परम पूज्य श्री महेन्द्र ऋषिजी म.सा. ने श्रमण सूर्य मरुधर केसरी पूज्य श्री मिश्रीमलजी म.सा. एवं लोकमान्य संत, शेरे राजस्थान वरिष्ठ प्रवर्तक श्री रूपचन्दजी म.सा. ‘रजत’ की जन्म जयंती पर दोनों महापुरुषों के व्यक्तित्व, कृतित्व और जिनशासन के प्रति उनके अप्रतिम योगदान का भावपूर्ण गुणगान किया।
आज का केंद्रीय संदेश—
“गुरु की खरी बात मान ली तो बेड़ा पार, उनके गुण जीवन में उतार लिए तो काम सवाया।”
पूज्य युवाचार्यश्री ने कहा कि महापुरुष केवल प्रशंसा के पात्र नहीं होते, वे अनुकरण के पात्र होते हैं। उनकी जन्म जयंती तभी सार्थक है, जब उनके गुणों को केवल शब्दों में गाया न जाए बल्कि जीवन और व्यवहार में उतारा जाए।
उन्होंने मरुधर केसरी श्री मिश्रीमलजी म.सा. की वाणी का स्मरण करते हुए कहा कि उनकी वाणी में ऐसी सहजता और शीतलता थी, जैसे मिश्री स्वयं घुल रही हो। वे धर्म की बात स्पष्टता से कहते थे, लेकिन उसमें कटुता नहीं—सुधार की करुणा होती थी।
वहीं लोकमान्य संत श्री रूपचन्दजी म.सा. ‘रजत’ के व्यक्तित्व में निर्णय की दृढ़ता और स्पष्टता की विशेष खनक थी। परिस्थिति कैसी भी हो, धर्म, संघ और मर्यादा के हित में निर्णय लेने का साहस उनके व्यक्तित्व की पहचान था।
मिश्रीमलजी की वाणी में मिश्री जैसी शीतलता, रूपचन्दजी ‘रजत’ के व्यक्तित्व में निर्णय की खनक।
युवाचार्यश्री ने महापुरुषों की उदार परंपरा का उल्लेख करते हुए कहा कि उन्होंने जो ज्ञान पाया, जो साधना अर्जित की, जो अनुभव मिला—उसे अपने तक सीमित नहीं रखा।
“गुरु ने जो पाया, संतों और भक्तों पर मुक्तहस्त लुटाया।”
उनका जीवन स्वयं के लिए संग्रह करने का नहीं, संघ और शासन को समृद्ध करने का जीवन था।
पूज्य युवाचार्यश्री ने विशेष प्रेरणा दी कि महापुरुषों की स्मृति को लेकर विभाजन की दीवारें खड़ी करने के बजाय उनके नाम पर संघ की एकता और शक्ति बढ़ानी चाहिए।
किस महापुरुष को कौन मानता है, किस परंपरा से कौन जुड़ा है—इन सीमाओं से ऊपर उठकर यह देखना चाहिए कि उन संतों ने संपूर्ण जिनशासन को क्या दिया।
“उनके नाम पर दीवारें नहीं, संघ को मजबूत करें।”
गुरु की खरी बात कभी-कभी उस समय कठोर लग सकती है, लेकिन सद्गुरु व्यक्ति को प्रसन्न करने के लिए नहीं, उसका जीवन संवारने के लिए बोलते हैं। इसलिए गुरु-वाणी का मूल्य केवल सुनने में नहीं, मानने और जीवन में उतारने में है।
✨ प्रवचन के प्रमुख संदेश
• महापुरुषों का गुणगान केवल प्रशंसा नहीं, गुण ग्रहण का अवसर है।
• सद्गुरु की खरी बात जीवन की दिशा बदल सकती है।
• गुरु की बात मानना श्रद्धा है, उनके गुण अपनाना वास्तविक भक्ति है।
• मिश्रीमलजी म.सा. की वाणी में सहजता, शीतलता और आत्मीयता थी।
• रूपचन्दजी म.सा. ‘रजत’ में निर्णय क्षमता, दृढ़ता और संघनिष्ठा विशेष थी।
• महापुरुषों ने अपने अर्जित ज्ञान और अनुभव को मुक्तहस्त बांटा।
• गुरु किसी व्यक्ति या समूह की सीमा में नहीं, संपूर्ण शासन की धरोहर हैं।
• महापुरुषों के नाम पर विभाजन नहीं, संघ की शक्ति बढ़नी चाहिए।
• जयंती का वास्तविक अर्थ उनके आदर्शों को जीवन में उतारना है।
• गुणगान तब पूर्ण होता है जब गुण हमारे व्यवहार में दिखाई देने लगें।
🙏 आइए, दोनों महापुरुषों की पावन जन्म जयंती पर केवल उनका स्मरण न करें, बल्कि यह संकल्प लें कि उनकी शीतलता, स्पष्टता, संघनिष्ठा, उदारता और धर्मसमर्पण हमारे जीवन में भी प्रकट हो।
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