झारखण्ड के लोक गीत के साथ मंदार की थाप और बासुरी की मधुर ध्वनि।
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झारखण्ड के आदिवासियों के नाच (नृत्य) और गीत मुख्य रूप से उनकी अपनी जनजातीय भाषाओं में होते हैं। झारखण्ड में 32 से अधिक अनुसूचित जनजातियाँ हैं, जिनमें प्रमुख हैं: संथाल (Santhals), मुंडा (Mundas), उरांव/ओरांव (Oraons/Kurukh), हो (Ho), खड़िया (Kharia) आदि। इनके गीत-नृत्य उनकी सांस्कृतिक पहचान, फसल, त्योहार (जैसे सरहुल, करम, सोहराई, मागे परब), विवाह, जन्म-मृत्यु आदि से जुड़े होते हैं।प्रमुख जनजातियों की भाषाएँ और उनके गीत-नृत्य यहाँ मुख्य उदाहरण दिए गए हैं:संथाल (Santhals):
गीत और नृत्य संथाली (Santhali) भाषा में होते हैं। संथाली ऑस्ट्रो-एशियाटिक परिवार की भाषा है, जिसकी अपनी ओल चिकी लिपि भी है। उनके प्रसिद्ध नृत्य जैसे डामकच, झुमइर आदि संथाली गीतों के साथ होते हैं।
मुंडा (Mundas):
मुंडारी (Mundari) भाषा में। मुंडा अपने नृत्य को दुरंग (durang) और गीत को सुसुन (susun) कहते हैं। उनके नृत्य जैसे पाइका, जादुर, जेना आदि मुंडारी गीतों के साथ होते हैं। मुंडा गीत कभी-कभी अन्य जनजातीय भाषाओं के साथ मिश्रित भी हो जाते हैं।
उरांव/ओरांव (Oraons या Kurukh):
कुरुख (Kurukh) भाषा में। नृत्य को वे दांडी (dandi) कहते हैं। प्रसिद्ध नृत्य जैसे करम दांडी, जगरा माथा, खद्दी, दुधिया आदि कुरुख गीतों के साथ होते हैं।
हो (Ho):
हो (Ho) भाषा में (जो मुंडारी से निकट रूप से संबंधित है)। उनके गीत-नृत्य हो भाषा में ही होते हैं, जैसे मागे परब या विवाह के गीत।
खड़िया (Kharia):
खड़िया (Kharia) भाषा में। उनके पारंपरिक गीत-नृत्य इसी भाषा में होते हैं।
अन्य भाषाएँ जिनमें गीत-नृत्य होते हैंनागपुरी (Nagpuri) और सदरी (Sadri): ये आदिवासी क्षेत्रों में बहुत प्रचलित हैं। नागपुरी झारखण्ड की एक प्रमुख लोक भाषा है (जिसे कभी-कभी "झारखण्डी" भी कहा जाता है)। कई आदिवासी समुदाय (विशेषकर नागपुरी प्रभाव वाले क्षेत्रों में) नागपुरी या सदरी में गीत गाते और नाचते हैं, खासकर झुमइर, डोमकच, फगुआ आदि में। ये भाषाएँ आदिवासी और गैर-आदिवासी दोनों समुदायों में जुड़ी हुई हैं।
कुछ क्षेत्रों में हिंदी का मिश्रण भी हो जाता है, लेकिन पारंपरिक गीत मुख्यतः जनजातीय भाषाओं में ही होते हैं।
सामान्य विशेषताएँझारखण्ड के आदिवासी नृत्य आमतौर पर सामूहिक होते हैं — पुरुष और महिलाएँ दोनों भाग लेते हैं। वाद्ययंत्र जैसे मंदार, नगाड़ा, ढोल, ढाक, बांसुरी, शहनाई आदि के साथ गीत गाए जाते हैं। गीत फसल कटाई, प्रकृति पूजा, प्रेम, वीरता आदि विषयों पर होते हैं।उदाहरण:झुमइर (Jhumair) — कई जनजातियों में प्रचलित, विभिन्न भाषाओं में।
करम नृत्य — उरांव में कुरुख भाषा में।
पाइका — मुंडा/नागपुरी क्षेत्र में।
छऊ नृत्य — सिरायकेला शैली झारखण्ड में प्रसिद्ध, लेकिन इसमें गीत कम और नृत्य-नाटक ज्यादा होता है।
झारखण्ड की आदिवासी संस्कृति में भाषाएँ विविध हैं, लेकिन वे सभी प्रकृति, सामुदायिक जीवन और परंपराओं से गहराई से जुड़ी हुई हैं। आजकल कई युवा कलाकार इन गीतों को नागपुरी, सदरी या मिश्रित रूप में भी प्रस्तुत करते हैं ताकि ज्यादा लोग समझ सकें।
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