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गोंड राजाओं की वीर कहानी - राजा #शंकर_शाह और #रघुनाथ शाह

Narrative With Neeraj - संवाद से विचार तक l

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गोंड राजाओं की वीर कहानी - राजा #शंकर_शाह और #रघुनाथ शाह

20 просмотров · 8 дней назад
Narrative With Neeraj - संवाद से विचार तक l
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कि राजा को फाँसी देने में वक्त लगेगा और विद्रोही इस बीच उन्हें बचाने की कोशिश भी कर सकते हैं। फाँसी की कार्यवाही में लगने वाले समय को देखते हुए ज़्यादा दिन तक राजा और उसके बेटे को ज़िंदा रखने पर बग़ावत के आसार ज़्यादा थे लिहाजा तोप से उड़ाने का निर्णय दिया गया। ऐसा करने के पीछे एक और वजह थी- स्थानीय लोगों और विद्रोहियों में डर बैठाना। 18 सितंबर 1857 की सुबह 11 बजे जबलपुर कोतवाली के सामने राजा शंकर शाह और उनके बेटे रघुनाथ शाह को सार्वजनिक तौर पर तोप के मुँह पर बाँधकर उड़ा दिया गया। इस दौरान 33वीं बटालियन (मद्रास रेजिमेंट) ने सुरक्षा का जिम्मा लिया। तोप से उड़ाने के बाद चारों तरफ़ राजा शंकर शाह और उनके बेटे का शव बिखरा हुआ था। अगले दिन रानी मान कुँवर ने राजा और राजकुमार के बिखरे हुए शरीर को इकट्ठा करके दफ़नाया। ब्रिटिश अधिकारी चार्ल्स बॉल अपनी किताब 'द हिस्ट्री ऑफ़ इंडियन म्यूटिनी' में लिखते हैं- "बुजुर्ग आदमी (शंकर शाह) विवशता और गर्व मिश्रित भाव के साथ तोपों की ओर आगे बढ़ा। वह स्वाभिमान से अपने अंतिम क्षण को देख रहा था। उसकी वीरता और गौरव को देखकर विरोधियों के मन भी दया का भाव पैदा हो गया लेकिन उनके बेटे रघुनाथ शाह के चेहरे पर वो तेज नहीं दिखाई दे रहा था।" इस घटना के प्रत्यक्षदर्शी और बांबे प्रेसिडेंसी से आये एक चिकित्सा अधिकारी कहते हैं- "मैं अभी-अभी विद्रोही राजा और उनके पुत्र को तोप से उड़ाये जाने का दृश्य देखकर वापस लौटा हूँ। वह एक भयानक दृश्य था, लेकिन वे इससे भी बहुत अधिक बुरी मौत के योग्य थे। यह पता चला कि पकड़ लिए जाने पर हम सभी को जिंदा ही भून दिया जाता। जब उन्हें तोप के मुँह पर बाँधा जा रहा था तो उन्होंने प्रार्थना की थी, कि भगवान उनके बच्चों की रक्षा करें, ताकि वे अंग्रेज़ों को ख़त्म कर सकें। हम नीचे उस जगह पहुँचे जहाँ दो तोपें रखी गई थीं और सहसा आक्रमण को रोकने के लिए पैदल और घुड़सवार सैनिकों की टुकड़ी तैनात थी। घुड़सवार सैनिक लोगों को तोपों के सामने से हटाने के लिए इधर उधर भाग रहे थे। क़ैदियों के आते ही, जो नितांत अनासक्त और निस्पृह दिखाई दे रहे थे, उनकी बेड़ियां तोड़कर भूमि पर डाल दी गईं। मैं उनके बहुत निकट था, क्योंकि हम सब अधिकारी एक घेरे के भीतर तोपों के पास थे, जहाँ भीड़ नहीं आ सकती थी। इसके बाद उन्हें तोप के मुँह से बाँध दिया गया। जैसा की आप जानते है मैं बहुत कोमल हृदय का व्यक्ति हूँ, और यदि मैंने इन हत्याकांडों के पूर्व यह दृश्य देखा होता, तो मैं अचेत हो गया होता। या फिर घर पर बीमार पड़ गया होता, किंतु मैं आपको विश्वास दिला सकता हूँ कि (हालाँकि) मेरे मन पर उन दोनों प्राणियों के प्रति, जिनके होठों पर वध हेतु प्रार्थना के स्वर थे, प्रयाण की भयानक गुरुता का भी बोझ था, फिर भी मैं परितुष्ट भावना से उनके चेहरों को देखने गया। तब भी मेरे मन में कानपुर, देहली, मेरठ, झाँसी, बरेली और फैजाबाद के बारे में विचार मंथन चल रहा था। वृद्ध पुरुष (जो मृत्यु के पहले कभी विचलित नहीं हुआ था) का और साथ ही युवा पुरुष (जिसकी आयु 40 वर्ष की होगी) का चेहरा भी शांत और गंभीर था। उनके पैर और हाथ, जो बाँध दिए गए थे, तोप के मुँह के पास पड़े थे और शरीर का ऊपरी भाग सामने की ओर लगभग पचास गज की दूरी पर जा गिरा था। उनके चेहरों को जरा भी क्षति नहीं पहुँची थी और वो बिल्कुल शांत थे।"⁴ भारतीय इतिहास में ये पहली बार था जब किसी राजा और उसके बेटे को एक साथ मारा गया। इस घटना के चार दिन बाद दिल्ली में 22 सितंबर, 1857 को मुग़ल बादशाह बहादुर शाह ज़फ़र के बेटों- मिर्ज़ा मुग़ल, मिर्ज़ा खिज़्र सुल्तान और पोते अबू बक्र को सरेआम गोली मार दी गई थी। राजा शंकर शाह और उनके बेटे रघुनाथ शाह के योगदान को गोंड कबीला आज तक नहीं भूला है। "18 सितंबर मध्य प्रदेश में बलिदान दिवस के रूप में मनाया जाता है। मध्य प्रदेश सरकार द्वारा छिंदवाड़ा विश्वविद्यालय का नाम राजा शंकर शाह विश्वविद्यालय किया गया है और एक संग्रहालय का निर्माण कराया जा रहा है।" गोंडवाना के इतिहास में शंकर शाह और रघुनाथ शाह हमेशा के लिए दर्ज हो गए हैं।