पहला पड़ाव: जिन हाथों ने शहर बनाए, उनका अपना घर कहाँ था? | श्रीलाल
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पहला पड़ाव: जिन हाथों ने शहर बनाए, उनका अपना घर कहाँ था? | श्रीलाल शुक्ल का कालजयी उपन्यास
पहला पड़ाव: जिन हाथों ने शहर बनाए, उनका अपना घर कहाँ था? | श्रीलाल शुक्ल का कालजयी उपन्यास
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जिस शहर की ऊँची इमारतें हमें विकास की कहानी सुनाती हैं, क्या हमने कभी उन हाथों की कहानी सुनी है जिन्होंने उन्हें बनाया?
हिंदी के कालजयी उपन्यासों की कथा-सार श्रृंखला की कड़ी 73 में प्रस्तुत है श्रीलाल शुक्ल का महत्वपूर्ण उपन्यास ‘पहला पड़ाव’।
1987 में प्रकाशित यह उपन्यास राज-मजदूरों, मिस्त्रियों, ठेकेदारों, इंजीनियरों और शिक्षित बेरोज़गारों की दुनिया को केंद्र में रखता है। कथा के महत्वपूर्ण पात्र संतोषकुमार उर्फ़ सत्ते के माध्यम से पाठक निर्माण-स्थल की उस दुनिया में प्रवेश करता है, जहाँ छत्तीसगढ़ क्षेत्र से आए मजदूर रोज़गार की तलाश में उत्तर प्रदेश में काम कर रहे हैं।
सत्ते स्वयं पढ़ा-लिखा है, लेकिन बेरोज़गारी उसे एक बन रही इमारत में मुंशी की भूमिका तक ले आती है। उसके आसपास जसोदा उर्फ़ मेमसाहब जैसे श्रमिक पात्र हैं, जिनके जीवन में मेहनत, गरीबी, पलायन, प्रेम, स्मृतियाँ और शोषण एक साथ मौजूद हैं।
‘पहला पड़ाव’ सिर्फ मजदूरों की कहानी नहीं है। यह उस समाज की कहानी है जहाँ कुछ लोग दूसरों के लिए इमारतें बनाते हैं, लेकिन खुद स्थायी जीवन और सम्मान की तलाश में भटकते रहते हैं।
क्योंकि हर पड़ाव मंजिल नहीं होता... कुछ पड़ाव सिर्फ जिंदगी काटने के लिए होते हैं।
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