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कृष्ण और बलराम का तुलादान, इंद्र के स्थान पर गोवर्धन की पूजा | Shri Krishna Jeevani

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कृष्ण और बलराम का तुलादान, इंद्र के स्थान पर गोवर्धन की पूजा | Shri Krishna Jeevani

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"बाल कृष्ण और बलराम पर बार-बार हो रहे संकटों के बचाने के लिए नन्दराय ऋषि मुनियों के सुझाव पर तुलादान का आयोजन करते है, जिसमें वह बरसाना के मुखिया वृषभानु को भी आमंत्रित करते है। बाल कृष्ण भी राधा जी को आमंत्रण का आभास कराते है। इसलिए राधा जी अपने पिता वृषभानु के साथ तुलादान कार्यक्रम में सम्मिलित होने के लिए आती है। पुरोहित गण मंत्रोच्चार के साथ तुलादान का कार्यक्रम प्रारम्भ करते है। तुला के एक पलड़े पर दान में दी जाने विभिन्न वस्तुएं रखे जाने के पश्चात पुरोहित दूसरे पलड़े में बाल कृष्ण को बैठने के लिए कहते है। जैसे ही बाल कृष्ण दूसरे पलड़े पर बैठते है, वह पलड़ा नीचा हो जाता है। नन्द राय दोनों पलड़ों को बराबर करने के लिए बार-बार दूसरे पलड़े में और अधिक आभूषणों से भरी थाल रखवाते है। लेकिन हर बार की तरह बाल कृष्ण का पलड़ा नीचे ही रहता है। यशोदा जी भी अपने आभूषणों को पलड़े में रखती है फिर भी बाल कृष्ण का पलड़ा वैसे का वैसा ही रहता है। यह देख राधा जी अपने बालों में लगे पुप्ष गुच्छ से एक फूल बलराम जी को पलड़े में रखने के देती है। जैसे ही बलराम वह फूल पलड़े में रखते है, दूसरा पलड़ा नीचे हो जाता है। यह देख सभी आश्चर्यचकित रह जाते है। बाल कृष्ण राधा जी से कहते है कि धरती पर उनकी पहली हार थी क्योंकि वह भावना के मूल्य में बिक जाते है। एक समय गोकुल में इंद्र को प्रसन्न करने के लिए महामुनि अभिलष द्वारा किए इंद्र यज्ञ को श्रीकृष्ण यह तर्क देते हुए रुकवा देते है कि गोकुलवासियों के जीवन का आधार इंद्र नहीं, बल्कि उनकी गायें और गोवर्धन पर्वत हैं। गायें दूध देती हैं और गोवर्धन उन गायों का अपनी घास, जल और फलों से पोषण करते है। इसलिए पूजा भी उन्हीं की होनी चाहिए। श्रीकृष्ण की बात मानकर गोकुलवासी इंद्र के स्थान पर गोवर्धन जी की पूजा करने लगते है। जिसे घमंडी इंद्र अपना अपमान समझता है और गोकुलवासियों को सबक सिखाने के लिए मेघों के नायक सावर्तक को गोकुल में प्रलय मचाने के लिए भेजता है तथा स्वयं ऐरावत पर बैठकर गोकुल की ओर चल पड़ता है। गोकुल में तूफान और वर्षा का तांडव शुरू हो जाता है। नर-नारी, पशु-पक्षी सभी भयभीत हो उठते है। श्रीकृष्ण इंद्र के अहंकार को चूर करने के लिए सभी गोकुलवासियों के उनके पशुओं के साथ गोवर्धन पर्वत की शरण में ले जाते है है और गोवर्धन पर्वत से प्रार्थना कर उनको अपनी कनिष्ठा उंगली पर उठा छत्र बना लेते है। सभी उस छत्र की शरण में आ जाते है। सबका भय दूर करने के लिए श्रीकृष्ण की मुरली बचाना प्रारम्भ करते है। जिससे इंद्र का क्रोध और बढ़ जाता है और वह श्रीकृष्ण पर अपने वज्र से प्रहार करते है। लेकिन श्रीकृष्ण अपनी माया से इंद्र के हाथ जड़वत कर देते है, जिससे इंद्र मूर्च्छित होकर गिर पड़ता है। तभी गुरु बृहस्पति प्रकट होते है और वह इंद्र को श्रीहरि की शरण में जाने की सलाह देते है। गुरु के कहने पर इंद्र ने गुप्त स्तोत्र का पाठ करना प्रारम्भ कर देते है, जिससे उसका अहंकार नष्ट हो जाता है। उसके हाथ ठीक हो जाते है और मौसम सामान्य हो जाता है। तब श्रीकृष्ण ने स्पष्ट करते है कि इंद्र का कर्तव्य जनता से अपनी पूजा करना नहीं, बल्कि समय पर वर्षा करके धरती को उपजाऊ बनाना है। कामधेनु माता के निवेदन पर श्रीकृष्ण ने इंद्र को क्षमा कर देते है। इंद्र कृतज्ञ होकर श्रीकृष्ण से कहते है कि वह उसके पुत्र अर्जुन को अपनी शरण में लेकर सुरक्षा प्रदान करें। सम्पूर्ण जगत में भगवान विष्णु के आठवें अवतार एवं सोलह कलाओं के स्वामी भगवान श्री कृष्ण काजीवन धर्म, भक्ति, प्रेम, और नीति का अद्भुत संगम है। वसुदेव और देवकी के पुत्र के रूप में कारागार में जन्म लेकर गोकुल की गलियों में यशोदा और नंदबाबा के यहाँ पलने वाले, अपनी लीलाओं, जैसे पूतना वध, माखन चोरी, राधा के संग प्रेम, गोपियों के साथ रासलीला और कालिया नाग के दमन के लिए प्रसिद्ध श्री कृष्ण ने युवावस्था में मथुरा कंस का वध करके जनमानस को उसके अत्याचार से मुक्त कराया एवं स्वयं के लिए द्वारका नगरी स्थापना भी की। उनका जीवन केवल लीलाओं तक सीमित नहीं था। उन्होंने समाज को धर्म और कर्म का गूढ़ संदेश देने के लिए महाभारत के युद्ध में पांडवों का मार्गदर्शन किया और अर्जुन के सारथी बनकर उसे "श्रीमद्भगवद्गीता" का उपदेश दिया, जो आज भी जीवन की समस्याओं का समाधान बताने वाला महान ग्रंथ माना जाता है। श्री कृष्ण का जीवन प्रेम, त्याग, और नीति का सर्वश्रेष्ठ उदाहरण है। आपका प्रिय चैनल "तिलक" श्री कृष्ण के जीवन से जुड़ा यह विशेष संस्करण "श्री कृष्ण जीवनी" आपके समक्ष प्रस्तुत है, जिसमें भगवान श्री कृष्ण के जीवन से जुड़ी कथाओं का संकलन किया गया है। भक्ति भाव से इनका आनन्द लीजिए और तिलक से जुड़े रहिए।