श्री सुसवाणी माता की कहानी Suswani Mataji ki Kahani सुसवाणी माता का जीवन चरित्र
Suswani Mataji
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श्री सुसवाणी माता का जीवन चरित्र
श्री सूरदास जी सुराणा को दिये वचन के अनुसार अम्बिका देवी नागौर के सेठ सतीदास जी सुराणा के यहां संवत् १२१६ में असोज सुदी २ वार सोमवार के दिन माता जी स्वयं उनकी पुत्री के रूप में प्रकट हुई। संवत् १२२६ में दस वर्ष की आयु में उनका विवाह सम्बन्ध दुगड़ परिवार में करना तय हुआ। श्री सुसवाणी जी जब बान बैठी तब वहां के मुसलमान सूबेदार ने उनके रूपलावण्य पर मुग्ध होकर स्वयं उनसे विवाह करने की ठान ली। सेठ सतीदास जी को बुलाकर उनके सामने अपना प्रस्ताव रखा, इस बात को सुनकर बहुत दुःखी हुए और कहा, "मुसलमान और हिन्दू के बीच यह विवाह संबंध कैसे हो सकता है?" किन्तु सूबेदार अपनी जिद पर था। आज्ञा पालन न करने पर उसने सारे परिवार को कोल्हू में पिसवाने की धमकी दी। सेठ सतीदास जी के रग-रग में हिन्दुत्व का खून भरा था इसलिए उन्होंने दृढ़ता से सूबेदार का प्रस्ताव ठुकरा दिया। फिर क्या था? सूबेदार ने तुरन्त ही उन्हें जेल भिजवा दिया।
इधर जब उनके परिवार वालों को इस बात का पता लगा तो सभी श्री सुसवाणी जी को कोसने लगे। तब वे दुःखी हो मन ही मन अरिहन्त भगवान का स्मरण करने लगी। प्रार्थना करते वक्त उन्हें नींद आ गई। स्वप्न में उन्हें किसी तेजस्वी मूर्ति ने दर्शन दिये और कहा "घबराने की कोई बात नहीं है तू उस दुष्ट सूबेदार को कहला दे कि सात पांव की छूट देकर पैदल या घोड़े पर तेरा पीछा करे यदि तुझे पकड़ सका तो तू उससे शादी कर लेगी वह ऐसा नहीं कर सकेगा। जिसकी प्रत्यक्ष प्रतीत यह है कि कल सुबह सभी सुराणा परिवार के सदस्यों के मस्तक पर केसर के तिलक लगे मिलेंगे।"
इतनी बात कह कर मूर्ति लोप हो गई श्री सुसवाणी जी उठी उसने अपने स्वप्न का सब हाल अपनी माताजी से कहा और उसके परिणाम स्वरूप सब के मस्तक पर केसर के तिलक देखे गये। सब को धैर्य बंधा, तुरन्त ही सूबेदार को सन्देश कहला भेजा गया सूबेदार सुन कर बड़ा प्रसन्न हुआ और तुरन्त स्वीकृति दे दी। दोनों तरफ उत्साह से तैयारियां होने लगीं। सेठ जी को मुक्त कर दिया गया। बहुत जल्दी ही खूब सज-धज कर कुछ सैनिकों को साथ लिये सूबेदार सेठ जी के मकान पर आ पहुंचा। श्री सुसवाणी जी भी प्रतीक्षा में थीं। दौड़ने से पूर्व उन्होंने अपने घर के दरवाजे पर कुम्कुम भरे हाथ का छापा मारा वह पत्थर में ज्यों का त्यों अंकित हो गया ।। सात पाँवडे की छूट लेकर श्री सुसवाणी जी आगे-आगे दौड़ने लगी और सूबेदार अपने सैनिकों सहित घोड़े पर बैठा उनका पीछा करने लगा। दौड़ते-दौड़ते दोनों बहुत दूर तक चले गये किन्तु उनके बीच का फासला उतना ही बना रहा। जब श्री सुसवाणी जी दौड़ते हुए थक गयी तो उन्होंने प्रार्थना की कि "हे प्रभो! मेरी रक्षा करो, मैं अब अधिक नहीं दोड़ सकती।" अधिष्ठायी देवी ने प्रार्थना सुनी तभी सामने से एक सिंह आता हुआ दिखाई पड़ा देवी जी ने आकाशवाणी में उन्हें सिंह पर सवार होकर आगे बढ़ने को कहा। आज्ञानुसार श्री सुसवाणी तुरन्त सिंह पर सवार हो गयी और सिंह दौड़ने लगा चलते-चलते वर्तमान बीकानेर के अन्तर्गत श्री सिन्धु मोरखाना गांव के नजदीक पहुंच गई। वहां भगवान शिवशंकर भोलेनाथ का अत्यंत प्राचीन मन्दिर था यहां पर भी श्री सुसवाणी जी ने भोलेनाथ से प्रार्थना की कि 'हे प्रभु! मेरी रक्षा करो। मुझे छिपने का स्थान दो।'
भोले शिव ने साक्षात् प्रकट होकर अपना चिमटा मन्दिर के सामने की ओर फेंका और कहा हे देवी तू सीधी चली जा जहां यह चिमटा गिरा है वही तेरा स्थान है। "भोलेनाथ का फेंका हुआ चिमटा एक केर के पेड के बीच में पड़ा था" श्री सुसवाणी के वहां पहुंचते ही पृथ्वी और वृक्ष दोनों शब्द करते हुए फटे। श्री सुसवाणी जी सिंह के सहित उसमें समा गई और जमीन फिर ज्यों की त्यों हो गई। श्री सुसवाणी जी के चीर का चार अंगुल पल्ला बाहर रह गया सूबेदार और उसके साथी उस पल्ले को लेकर ही झगड़ने लगे सभी उससे विवाह करना चाहते थे। बात बढ़ गयी तलवारें खिंच गई और वे वहीं आपस में लड़कर समाप्त हो गये। जिनकी देवलियां आज भी विद्यमान हैं। श्री सुसवाणी जी का यह आश्रय वृक्ष सं० १२२६ से लेकर आज तक भी उसी स्थान पर हरा भरा खड़ा है।