Перейти к содержимому

श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 5 (Class 10/13) ज्ञानी के अखंड सुख का रहस्य

Subodhanand Foundation

0:00 / 0:00

श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 5 (Class 10/13) ज्ञानी के अखंड सुख का रहस्य

404 просмотра · 1 мес. назад
Subodhanand Foundation
2,33 тыс. подписчиков
404 просмотра · 1 мес. назад
श्रीमद्भगवद्गीता के 5वें अध्याय की इस 10वीं कक्षा में आपका स्वागत है! 🙏 पूरी 13 वीडियो की श्रृंखला को क्रमबद्ध देखने के लिए यहाँ क्लिक करें (पूरी प्लेलिस्ट): 👉    • श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 5   हमें सांसारिक सुखों से इतना लगाव क्यों है, और वे सुख अंततः दुख का कारण क्यों बन जाते हैं? एक ज्ञानी व्यक्ति सुख-दुख और प्रिय-अप्रिय परिस्थितियों का सामना कैसे करता है? इस परम ज्ञानवर्धक कक्षा में परम पूज्य स्वामी ध्रुव चैतन्य जी ने गीता के 5वें अध्याय के 20वें, 21वें और 22वें श्लोक की बहुत ही तार्किक और गहरी व्याख्या की है। स्वामी जी ने वेदांत के उस अद्भुत रहस्य को खोला है कि 'सुख किसी विषय (वस्तु या व्यक्ति) में नहीं, बल्कि हमारी आत्मा में है।' इसके साथ ही प्रातिभासिक, व्यावहारिक और पारमार्थिक आत्मा के भेद को भी बहुत ही सरलता से समझाया गया है। यदि आप भी अपने जीवन में 'अक्षय सुख' (कभी न खत्म होने वाले सुख) की तलाश में हैं, तो यह प्रवचन आपको नई दृष्टि प्रदान करेगा। 🕒 वीडियो के मुख्य अंश (समय-सीमा): आप अपनी सुविधानुसार किसी भी विषय पर सीधा जाने के लिए नीचे दिए गए समय पर क्लिक कर सकते हैं: [00:00] मंगलाचरण एवं गीता पाठ (श्लोक 20-22) [03:13] आत्मा के 3 रूप: प्रातिभासिक, व्यावहारिक और पारमार्थिक [07:03] श्लोक 20: न प्रहृष्येत्प्रियं प्राप्य - ज्ञानी प्रिय की प्राप्ति में हर्षित और अप्रिय में उद्विग्न क्यों नहीं होता? [11:54] भगवान श्री राम का दृष्टांत: अप्रिय में रुदन और प्रिय में संयम का अभिनय [14:48] प्रिय और अप्रिय को संभालने की 3 दृष्टियां (भक्त, कर्मवादी और भौतिकवादी) [20:02] एक ज्ञानी (संन्यासी) की मृत्यु पर शोक क्यों नहीं, उत्सव क्यों मनाया जाता है? [27:05] देह को आत्मा मानने वाले कभी हर्ष-विषाद से मुक्त नहीं हो सकते (शांकरभाष्य) [29:29] श्लोक 21: बाह्यस्पर्शेष्वसक्तात्मा - ज्ञानी की बाहरी विषयों में प्रीति (आसक्ति) क्यों नहीं होती? [36:12] ज्ञानी को संसार के विषय सुख क्यों नहीं दे सकते? [38:47] सुख और आनंद में क्या अंतर है? (गीता में 'आनंद' शब्द का प्रयोग क्यों नहीं है?) [43:08] एक वेदांतिक रहस्य: सुख बाहरी विषय से नहीं, आपकी 'आत्मा' से आता है [50:33] ज्ञानी का व्यवहार कैसा होता है? (पूज्य गुरुजी का प्रेमपूर्ण दृष्टांत) [01:05:01] श्लोक 22: ये हि संस्पर्शजा भोगा - संसार के सारे सुख 'दुःखयोनय' (दुख का कारण) क्यों हैं? [01:11:12] श्रेष्ठ का वियोग 'आनंद गर्भित' होता है और निकृष्ट का वियोग 'शोक गर्भित' [01:12:35] 'आद्यन्तवन्तः कौन्तेय' - विषय सुखों का प्रारंभ और अंत निश्चित है ✨ इस वीडियो से आपको क्या सीखने को मिलेगा? हमारी सबसे बड़ी भ्रांति यह है कि सुख किसी बाहरी वस्तु या व्यक्ति से मिलता है। वास्तव में, जब हमारी कोई इच्छा पूरी होती है तो मन शांत हो जाता है, और उस शांत मन में हमारी 'आत्मा' का सुख ही प्रकट होता है। संसार के जितने भी 'संस्पर्शज भोग' (इंद्रियों और विषयों के संपर्क से मिलने वाले सुख) हैं, वे सभी दुख की खान हैं क्योंकि उनका प्रारंभ और अंत निश्चित है। ज्ञानी बाहरी विषयों में आसक्त नहीं होता क्योंकि उसे अपने भीतर ही 'अक्षय सुख' (अटूट सुख) मिल जाता है। 🔔 हमसे जुड़े रहें! अगर आपको यह ज्ञानवर्धक व्याख्या पसंद आई हो, तो कृपया वीडियो को लाइक (Like) करें, अपने मित्रों और परिवार के साथ साझा (Share) करें, और चैनल को सब्सक्राइब (Subscribe) करना न भूलें! #श्रीमद्भगवद्गीता #गीता_अध्याय_5 #स्वामी_ध्रुव_चैतन्य #सुबोधनंद_फाउंडेशन #वेदांत #सनातन_धर्म #अक्षय_सुख #जीवन_मुक्ति #गीता_ज्ञान