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सुर को शोभे भले, नीति यह नहीं शोभती नर को। 🔥 | Karna Exposes Indra's Trick | Rashmirathi

SHEKHAR SUMAN

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सुर को शोभे भले, नीति यह नहीं शोभती नर को। 🔥 | Karna Exposes Indra's Trick | Rashmirathi

100 просмотров · 2 недели назад
SHEKHAR SUMAN
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"एक बाज का पंख तोड़ कर करना अभय अपर को, सुर को शोभे भले, नीति यह नहीं शोभती नर को।" 🔥 Welcome to one of the most fiery and sarcastic exchanges in Ramdhari Singh 'Dinkar's Rashmirathi (Canto 4). In this incredible segment, Karna realizes that the beggar is Lord Indra, who has come to strip him of his armor to ensure Arjuna's survival. Instead of begging for his life, Karna unleashes a brilliant, mocking critique of this so-called "bravery." He questions how Arjuna can ever be called a true hero if his victory relies on breaking the wings of his enemy through deceit before the battle even begins. He even sarcastically suggests that if Arjuna is so desperate for an easy win, he should build a wax statue of Karna and defeat that instead! Yet, in a display of unmatched warrior pride, Karna agrees to give up his divine Kavach and Kundal, welcoming the chance to fight Arjuna on equal footing as a normal mortal. 📜 Verses recited in this video: क्षमा कीजिए, इस रहस्य को तुरत न जान सका मैं, छिप कर आये आप, नहीं इससे पहचान सका मैं। दीन विप्र ही समझ कहा – धन, धाम, धरा लेने को, था क्या मेरे पास, अन्यथा, सुरपति को देने को? केवल गन्ध जिन्हे प्रिय, उनको स्थूल मनुज क्या देगा? और व्योमवासी मिट्टी से दान भला क्या लेगा? फिर भी, देवराज भिक्षुक बनकर यदि हाथ पसारे, जो भी हो, पर इस सुयोग को, हम क्यों अशुभ विचारें? अतः आपने जो माँगा है दान वही मैं दूँगा, शिवि-दधिचि की पंक्ति छोड़कर जग में अयश न लूँगा। पर कहता हूँ, मुझे बना निस्त्राण छोड़ते हैं क्यों? कवच और कुंडल ले करके प्राण छोड़ते हैं क्यों? यह, शायद, इसलिए कि अर्जुन जिए, आप सुख लूटे, व्यर्थ न उसके शर अमोघ मुझसे टकराकर टूटे। उधर करें बहु भाँति पार्थ कि स्वयं कृष्ण रखवाली, और इधर मैं लडू लिये यह देह कवच से खाली। तनिक सोचिये, वीरों का यह योग्य समर क्या होगा? इस प्रकार से मुझे मार कर पार्थ अमर क्या होगा? एक बाज का पंख तोड़ कर करना अभय अपर को, सुर को शोभे भले, नीति यह नहीं शोभती नर को। यह तो निहत शरभ पर चढ़ आखेटक पद पाना है, जहर पिला मृगपति को उस पर पौरुष दिखलाना है। यह तो साफ समर से होकर भीत विमुख होना है, जय निश्चित हो जाय, तभी रिपु के सम्मुख होना है। देवराज! हम जिसे जीत सकते न बाहु के बल से, क्या है उचित उसे मारें हम न्याय छोड़कर छल से? हार-जीत क्या चीज? वीरता की पहचान समर है, सच्चाई पर कभी हार कर भी न हारता नर है। और पार्थ यदि बिना लड़े ही जय के लिये विकल है, तो कहता हूँ, इस जय का भी एक उपाय सरल है। कहिए उसे, मोम की मेरी एक मूर्ति बनवाए, और काट कर उसे, जगत मे कर्णजयी कहलाए। जीत सकेगा मुझे नहीं वह और किसी विधि रण में, कर्ण-विजय की आश तड़प कर रह जायेगी मन में। जीते जूझ समर वीरों ने सदा बाहु के बल से, मुझे छोड़ रक्षित जन्मा था कौन कवच-कुंडल से? मैं ही था अपवाद, आज वह भी विभेद हरता हूँ, कवच छोड़ अपना शरीर सबके समान करता हूँ। अच्छा किया कि आप मुझे समतल पर लाने आये, हर तनुत्र दैवीय; मनुज सामान्य बनाने आये। #Rashmirathi #Karna #LordIndra #Arjuna #RamdhariSinghDinkar #HindiPoetry #Mahabharata #DinkarKavita #poemrecitation