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माण्डूक्यकारिका - अद्वैत प्रकरण - 18 | परम पूज्य स्वामी श्री अखण्डानन्द सरस्वती जी महाराज |

AnandVrindavan

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माण्डूक्यकारिका - अद्वैत प्रकरण - 18 | परम पूज्य स्वामी श्री अखण्डानन्द सरस्वती जी महाराज |

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AnandVrindavan
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माण्डूक्यकारिका - अद्वैत प्रकरण - 18 | परम पूज्य स्वामी श्री अखण्डानन्द सरस्वती जी महाराज |    • माण्डूक्यकारिका - अद्वैत  प्रकरण - 18 | पर...   इस प्रवचन में परम पूज्य महाराजश्री अद्वैत प्रकरण की गहन दार्शनिक व्याख्या कर रहे हैं। प्रवचन के मुख्य बिंदु इस प्रकार हैं: 1. द्वैत और अद्वैत की सत्ता का स्वरूप (0:45 - 3:00): परम पूज्य महाराजश्री स्पष्ट करते हैं कि परमार्थ रूप से केवल 'अद्वैत' ही सत्य है। द्वैत और अद्वैत की समान सत्ता नहीं है। जैसे स्वप्न का शेर जागृत शरीर को नहीं खा सकता, वैसे ही प्रातिभाषिक द्वैत व्यावहारिक या पारमार्थिक सत्य को प्रभावित नहीं कर सकता। 2. ज्ञानी और कर्मी के व्यवहार में भेद (5:07 - 10:00): वेदांत में ज्ञानी और कर्मी के बीच कोई वास्तविक विरोध नहीं है। ज्ञानी देह, वाणी और अंतःकरण के साक्षी के रूप में स्थित होता है, जबकि कर्मी व्यवहार में लगा रहता है। ज्ञानी को किसी के कर्म करने से कोई हानि नहीं है। 3. वेदांत में 'त्याग' का अर्थ (10:37 - 14:00): वेदांत में त्याग का अर्थ किसी वस्तु को छोड़ना नहीं, बल्कि 'त्यक्त को त्यक्त' जानना है। जैसे रस्सी का ज्ञान होने पर सांप का भ्रम अपने आप दूर हो जाता है, वैसे ही अधिष्ठान (आत्मा) के ज्ञान से अध्यस्त जगत का मिथ्यात्व समझ में आ जाता है। 4. भेद और विनाश का संबंध (16:46 - 25:00): 'भेद' का अर्थ फूटना या खंडित होना है। जो भी पदार्थ भेदवान है, वह विनाशवान है। चूंकि आत्मा अजन्मा (अज) और निरवयव है, इसलिए उसमें कोई भेद नहीं होता। अतः जो भेद को ही परमार्थ मानते हैं, वे वास्तव में सत्य को नहीं समझ रहे हैं। 5. ईश्वर और माया का सिद्धांत (26:02 - 35:00): ईश्वर की सिद्धि भी आत्मा के आधार पर ही है। माया के माध्यम से ईश्वर को सृष्टि का कर्ता माना जाता है, परंतु परमार्थ दृष्टि से वह भी एक उपाधि मात्र है। स्वामी जी जोर देते हैं कि संसार ईश्वर में 'घुस' नहीं गया है और न ही ईश्वर 'अंकुरित' होकर संसार बना है; सत्य ज्यों का त्यों (अद्वैत) है। #swamiakhandanandsaraswati #mandukyaadvaitprakaran #anandprastuti #satsang #anandvrindavanashram