माण्डूक्यकारिका - अद्वैत प्रकरण - 03 | परम पूज्य स्वामी श्री अखण्डानन्द सरस्वती जी महाराज |
Swami Akhandanand Saraswati By Anand Prastuti
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माण्डूक्यकारिका - अद्वैत प्रकरण - 03 | परम पूज्य स्वामी श्री अखण्डानन्द सरस्वती जी महाराज |
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माण्डूक्यकारिका - अद्वैत प्रकरण - 03 | परम पूज्य स्वामी श्री अखण्डानन्द सरस्वती जी महाराज |
🔗 • माण्डूक्यकारिका - अद्वैत प्रकरण - 03 |...
पूज्य महाराजश्री इस सत्संग में (माण्डूक्यकारिका - अद्वैत प्रकरण) में आत्मा और ब्रह्म के स्वरूप का अत्यंत सरल और दार्शनिक विश्लेषण किया गया है।
मुख्य बिंदु -
🔸1. आत्मा और आकाश का दृष्टांत (0:42 - 18:00): पूज्य महाराजश्री ने आत्मा की व्यापकता को समझाने के लिए 'आकाश' का उदाहरण दिया है। जैसे घड़े के फूटने पर भीतर का आकाश नष्ट नहीं होता, उसी प्रकार शरीर के नष्ट होने पर आत्मा का नाश नहीं होता। आत्मा अजात (अजन्मा) और अपरिवर्तनीय है।
🔸2 . भ्रांति और अधिष्ठान (3:33 - 5:47): रज्जु (रस्सी) और सर्प के उदाहरण से यह स्पष्ट किया गया है कि अज्ञान के कारण हम सत्य में असत्य का आरोपण करते हैं। जैसे रस्सी पर सांप का होना केवल एक भ्रम है, वैसे ही संसार और देह का अहंकार केवल अज्ञान की अवस्था में ही प्रतीत होता है।
🔸3 . अज्ञान की निवृत्ति (24:43 - 26:29): पूज्य महाराजश्री ने समझाया कि अज्ञान अनादि होने पर भी ज्ञान के प्रकाश से मिटाया जा सकता है। जैसे अभ्यास से अक्षर (क, ख, ग) सीखे जाते हैं, वैसे ही आत्म-ज्ञान से अज्ञान का नाश संभव है।
🔸 4 . शरीर और उपाधि का विचार (30:00 - 32:48): शरीर पंचभूतों से निर्मित एक 'संघात' (जुड़ा हुआ ढांचा) है। आत्मा इस शरीर से उपहित होने के कारण सीमित दिखाई देती है, जबकि वास्तव में वह अनंत है।
🔸5 .जीव और ईश्वर का एकत्व (37:10 - 42:46): पूज्य महाराजश्री ने कहा कि देह से उपहित (जुड़ा हुआ) जीव है और अनूपहित परमात्मा है। असल में परमात्मा में जीव और ईश्वर का कोई भेद नहीं है। शरीर देवालय है और जीव ही स्वयं परम शिव है, जिसे 'सोहम' भाव से पहचानना ही पूजा है।
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