समयसार गाथा 6 | शुद्धात्मा का असली स्वरूप क्या है? | Samaysar Gatha 6 l आचार्य कुंदकुंद l
JaiJinedra
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समयसार गाथा 6 | शुद्धात्मा का असली स्वरूप क्या है? | Samaysar Gatha 6 l आचार्य कुंदकुंद l
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समयसार की छठी गाथा में आचार्य कुंदकुंद एक बहुत गहरा सत्य खोलते हैं — शुद्ध आत्मा का ज्ञायक स्वभाव न प्रमत्त अवस्था में है, न अप्रमत्त अवस्था में। यह दोनों सिर्फ बदलती हुई पर्यायें हैं, जबकि आत्मा का असली स्वरूप इन दोनों का शुद्ध साक्षी है। और गाथा का सबसे गहरा संदेश — "जो जाना गया, वही आत्मा है, कोई और नहीं।"
इस वीडियो में जानिए:
✅ समयसार गाथा 6 का मूल पाठ और शब्द-दर-शब्द अर्थ
✅ गुणस्थान, प्रमत्त और अप्रमत्त अवस्था का गहरा भेद
✅ दर्पण और सूरज-रोशनी के दृष्टांत से ज्ञायक भाव को समझें
✅ ज्ञाता और ज्ञेय की एकता — "जो जाना गया, वही है"
✅ रोज़मर्रा की ज़िंदगी में गुस्से, उदासी जैसे भावों को साक्षी भाव से कैसे देखें
यह वीडियो जैन दर्शन, अध्यात्म और आत्म-ज्ञान में रुचि रखने वाले सभी दर्शकों के लिए है — चाहे आप श्रावक हों, विद्यार्थी हों, या आध्यात्मिक जिज्ञासु हों।
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📌 पिछली वीडियो: समयसार गाथा 5 — आचार्य कुंदकुंद की प्रतिज्ञा 📌 अगली वीडियो: समयसार गाथा 7 — व्यवहार और निश्चय से ज्ञानी आत्मा
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Disclaimer:यह वीडियो धार्मिक, आध्यात्मिक एवं शैक्षिक उद्देश्य से प्रस्तुत किया गया है। इसमें दिए गए अर्थ, व्याख्या और प्रस्तुति का उद्देश्य जैन दर्शन एवं समयसार के भावों को सरल रूप में समझाने का प्रयास है। विभिन्न आचार्यों एवं टीकाकारों की व्याख्याओं में अंतर संभव है। यह सामग्री धार्मिक एवं आध्यात्मिक अध्ययन तथा आत्मचिंतन के उद्देश्य से प्रस्तुत की गई है। इसका उद्देश्य किसी प्रकार की धार्मिक, चिकित्सकीय या व्यावसायिक सलाह देना नहीं है।
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समयसार का मूल धार्मिक साहित्य आचार्य कुन्दकुन्द की रचना है; यहाँ प्रस्तुत आधुनिक audio/visual presentation Jai Jinendra की original creative presentation है।