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दैनिक वैदिक हवन-संध्या-स्वाध्याय

श्रीमती विद्यावती वैदिक ट्रस्ट

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दैनिक वैदिक हवन-संध्या-स्वाध्याय

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श्रीमती विद्यावती वैदिक ट्रस्ट
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साहित्य संगम संस्थान - मुख्य मंच समाधि सप्ताह : कोलाहल के बीच अंतर्यात्रा दिनांक - 10 सितंबर 2026, गुरुवार आज की विधा - संस्मरण *समाधि सूत्र - *"तस्यापि निरोधे सर्वनिरोधान्निर्बीजः समाधिः।" (योगसूत्र 1.51) *हिंदी सरलार्थ -* उस निरोध-संस्कार के भी निरोध हो जाने पर, सभी वृत्तियों के पूर्णतः शांत हो जाने से निर्बीज समाधि सिद्ध होती है। जहाँ बीज भी जल जाता है और केवल शांति शेष रहती है - जहाँ स्मृति भी मौन हो जाती है। --- 🙏 विषय प्रवर्तन 🙏 सादर नमन। संस्मरण का अर्थ है - सम्यक स्मरण। पर आज का सूत्र कहता है - स्मृति के भी पार चले जाना। कैसा विरोधाभास है! आज संस्मरण विधा में हमें उस अवस्था को याद करना है, जहाँ यादें ही नहीं बचतीं। महर्षि पतंजलि ने योग को परिभाषित किया - "योगश्चित्तवृत्तिनिरोधः"। चित्त की वृत्तियों का निरोध। और उस निरोध की भी अंतिम अवस्था है - निर्बीज समाधि। जहाँ साधना का बीज भी गल जाता है। आज का संस्मरण किसी घटना का नहीं, उस घटना के मिट जाने का संस्मरण है। इसी भाव को समझने के लिए, आइए कल्पना करें - यदि महर्षि पतंजलि स्वयं अपना संस्मरण लिखते तो क्या लिखते? एक कल्पित संस्मरण : महर्षि पतंजलि की लेखनी से "वह दिन जब शब्द छूट गए" मुझे स्मरण है, वह कोई दिन नहीं था। मैं कई वर्षों से सूत्र गूँथ रहा था। शब्दों को साध रहा था। चित्त की वृत्तियों को नाम दे रहा था - प्रमाण, विपर्यय, विकल्प, निद्रा, स्मृति। लोग समझते हैं मैं योग सिखा रहा था। मैं तो स्वयं सीख रहा था। एक संध्या, जब मैंने लिखा - "तस्यापि निरोधे सर्वनिरोधान्" - तो अचानक लेखनी रुक गई। मैंने जिस निरोध का वर्णन किया था, उसी ने मुझे पकड़ लिया। सामने भोजपत्र था, पर अब उस पर कुछ लिखना शेष नहीं था। भीतर कोई वृत्ति नहीं थी जिसे नाम दूँ। बाहर कोई शब्द नहीं था जो भीतर की शून्यता को कह सके। उस क्षण मुझे पहली बार लगा - मैं पतंजलि नहीं हूँ। यह देह, यह नाम, यह शास्त्र-रचना का अहंकार - सब वृत्ति ही तो थे। और वे सब निरुद्ध हो गए। क्या बचा? कुछ नहीं। और वही 'कुछ नहीं' सब कुछ था। उसे मैं सविज्ञात नहीं कह सका, क्योंकि वहाँ ज्ञाता नहीं था। उसे आनंद नहीं कहा, क्योंकि भोक्ता नहीं था। बस एक मौन था - बीज-रहित, शोक-रहित, शब्द-रहित। बहुत देर बाद जब मैं लौटा, तो भोजपत्र पर केवल आँसू की एक बूँद थी। उसी को लोगों ने सूत्र समझ लिया। मैं आज भी नहीं जानता कि समाधि क्या है। मैं केवल इतना जानता हूँ कि समाधि वह नहीं है जिसे मैं लिख सका। समाधि वह है जहाँ लेखक स्वयं मिट जाता है और केवल लेखन रह जाता है - बिना स्याही के। पतंजलि (एक कल्पित संस्मरण) --- *अब आपकी बारी -* आज संस्मरण विधा में लिखिए - 1. जीवन का वह क्षण जब आप सब कुछ भूल कर केवल 'होने' में थे - चाहे वह पहाड़ों में हो, माँ की गोद में हो, या किसी रचना को पढ़ते हुए। 2. वह संस्मरण जहाँ स्मृति मौन में बदल गई हो। 3. निर्बीज होने का अनुभव - जब कोई चाह, कोई बीज मन में न बचा हो। यह संस्मरण किसी तीर्थ का भी हो सकता है, किसी पुस्तक का भी, और अपने ही भीतर के मौन का भी। आइए, आज मंच पर ऐसे संस्मरण लिखें जो यादों की भीड़ नहीं, यादों के पार ले जाएँ। बीज से शून्य की ओर! *- साहित्य संगम संस्थान, मुख्य मंच*