दैनिक वैदिक हवन-संध्या-स्वाध्याय
श्रीमती विद्यावती वैदिक ट्रस्ट
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साहित्य संगम संस्थान मुख्य मंच
समाधि सप्ताह
विषय प्रवर्तन - शनिवार समीक्षा दिवस
नमन मंच!
साहित्य संगम संस्थान के इस पावन पटल पर, इस शनिवारीय समीक्षा दिवस पर आप सभी साहित्य साधकों का हार्दिक स्वागत, वंदन, अभिनंदन है।
आज का दिन दोहरी साधना का दिन है।
पहला - हमारी मासिक ई-पत्रिका "भावों की महक" की समीक्षा।
"भावों की महक" केवल एक पत्रिका नहीं, यह योगशाला की साधना है, जिसकी सुगंध को हमारी यशस्वी संपादक डॉ. इन्दु शर्मा 'शचि' जी पूरे मनोयोग से देश-भर में बिखेर रही हैं। अगस्त अंक 2026, स्वतंत्रता विशेषांक के रूप में हमारे सामने है। जिसमें देशभक्ति, योग, और आत्मचिंतन के त्रिवेणी संगम के दर्शन होते हैं। आज हम इसकी रचनाओं की, इसकी साज-सज्जा की, और इसके पीछे के अथक परिश्रम की समीक्षा करेंगे।
दूसरा - समाधि सप्ताह की समीक्षा।
योगशाला में हम केवल शब्द नहीं साधते, हम स्वयं को भी साधते हैं।
पिछला पूरा सप्ताह 'समाधि सप्ताह' के रूप में मनाया गया।
*समाधि -* सम् + आध, अर्थात् मन को सम्यक रूप से एकाग्र करना।
व्याध, अबाध, निर्बाध, साध, आराध - इन सभी शब्दों की यात्रा अंततः समाधि पर ही तो पूर्ण होती है। जब चित्त की सारी बाधाएं हट जाती हैं, तब जो अबाध, निर्बाध स्थिति आती है, वही समाधि है।
इस सप्ताह हम सभी ने जाना कि -
साधना में बाधा आना स्वाभाविक है,
पर साधक वही है जो अबाध भाव से, निर्बाध गति से, राध भाव से अर्थात आराधना के भाव से लगा रहे और अंत में समाधि को प्राप्त करे।
तो आइए आज के इस समीक्षा सत्र में हम खुले मन से, निर्भीक होकर, परस्पर सीखते-सिखाते हुए -
1. पत्रिका की रचनाओं पर अपनी सारगर्भित समीक्षा रखें।
2. समाधि सप्ताह के अपने अनुभव साझा करें।
3. एक-दूसरे की लेखनी को और अधिक निखारने के लिए सुझाव दें।
मुझे विश्वास है, आज का यह शनिवार, साहित्य और साधना दोनों के लिए अत्यंत फलदायी होगा।
इसी मंगलकामना के साथ मैं आज के समीक्षा सत्र का शुभारंभ करता/करती हूँ।
जय हिंद, जय हिंदी, जय संगम।