उर्गम घाटी की उत्तम गाथा।
Vrikshabandhan Abhiyan
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उत्तराखंड के चमोली जिले में अलकनंदा नदी घाटी की सुरम्य वादियों में स्थित ऊर्गम घाटी (उरांग घाटी) देवभूमि की सबसे आध्यात्मिक, शांत और निसर्ग-सुंदर घाटियों में से एक है। हरे-भरे बुग्यालों (घास के मैदानों), देवदार के सघन वनों और कल-कल बहती धाराओं से घिरी यह घाटी पंच केदार और सप्त बद्री परंपराओं का एक अनूठा केंद्र है।
१. श्री कल्पेश्वर महादेव (श्री कल्पनाथ)
पंच केदारों में से पाँचवें केदार के रूप में पूजे जाने वाले श्री कल्पेश्वर महादेव ऊर्गम घाटी में ही स्थित हैं।
पौराणिक संदर्भ: महाभारत युद्ध के पश्चात पांडव शिव दर्शन के लिए निकले थे। मान्यता है कि यहाँ भगवान शिव की जटाओं (केश) के दर्शन और पूजा होती है।
विशेषता: यह पंच केदारों में एकमात्र ऐसा धाम है जहाँ भगवान शिव के कपाट वर्षभर (12 महीने) खुले रहते हैं और श्रद्धालु सदैव दर्शन पा सकते हैं।
मंत्र / श्लोक:
{ॐ नमः शिवाय}
जटाटवीगलज्जलप्रवाहपावितस्थले गलेऽवलम्ब्य लम्बितां भुजङ्गतुङ्गमालिकाम्। डमड्डमड्डमड्डमन्निनादवड्डमर्वयं चकार चण्डताण्डवं तनोतु नः शिवः शिवम्॥
२. श्री ध्यान बद्री (योग ध्यान बद्री / ध्यान बद्री)
सप्त बद्री श्रृंखला का एक अत्यंत पावन और शांत केंद्र, जो ऊर्गम घाटी के निकट कल्पगंगा के समीप स्थित है।
पौराणिक संदर्भ: कहा जाता है कि राजा पांडु ने अपने जीवन के अंतिम क्षणों में यहाँ गहन तपस्या की थी और भगवान विष्णु का ध्यान किया था।
विशेषता: मंदिर में स्थापित भगवान विष्णु की प्रतिमा ध्यान मुद्रा में स्थित है। यह स्थान साधना, मानसिक शांति और आत्म-साक्षात्कार के लिए अत्यंत सिद्ध माना जाता है।
मंत्र / श्लोक: शान्ताकारं भुजगशयनं पद्मनाभं सुरेशं विश्वाधारं गगनसदृशं मेघवर्णं शुभाङ्गम्। लक्ष्मीकान्तं कमलनयनं योगिभिर्ध्यानगम्यं वन्दे विष्णुं भवभयहरं सर्वलोकैकनाथम्॥
३. श्री बंशी नारायण एवं 'वृक्षबंधन पूजा' (रक्षाबंधन परंपरा)
ऊर्गम घाटी (कलगोठ गाँव के ऊपरी बुग्यालों में) लगभग 13,000 फीट की ऊँचाई पर स्थित श्री बंशी नारायण मंदिर अपनी अनूठी मान्यताओं और परंपराओं के लिए पूरे विश्व में प्रसिद्ध है।
वर्ष में केवल एक दिन दर्शन: यह मंदिर वर्ष के 364 दिन बंद रहता है और केवल रक्षाबंधन (श्रावण पूर्णिमा) के दिन ही इसके कपाट श्रद्धालुओं के लिए खोले जाते हैं। पौराणिक मान्यता है कि शेष 364 दिन स्वयं देवर्षि नारद यहाँ भगवान श्रीहरि बंशी नारायण की पूजा-अर्चना करते हैं।
पाताल लोक और रक्षाबंधन कथा: जब भगवान विष्णु राजा बलि के द्वारपाल बनकर पाताल लोक चले गए थे, तब माता लक्ष्मी ने बलि को रक्षासूत्र बाँधकर श्रीहरि को मुक्त कराया था। माना जाता है कि पाताल से लौटकर भगवान विष्णु सर्वप्रथम इसी स्थान पर प्रकट हुए थे। * वृक्षबंधन एवं रक्षासूत्र परंपरा: रक्षाबंधन के दिन स्थानीय ग्रामीण और क्षेत्र की बहनें यहाँ पहुँचकर भगवान बंशी नारायण को रक्षासूत्र (राखी) और माखन-मिश्री का भोग अर्पित करती हैं। इसके साथ ही, यहाँ 'वृक्षबंधन' की अनूठी पर्यावरण-संरक्षण परंपरा निभाई जाती है। श्रद्धालु हिमालयी पर्यावरण, बुग्यालों और देवदार-बाँज के वृक्षों की रक्षा का संकल्प लेते हुए प्रकृति और वृक्षों को भी रक्षासूत्र बाँधते हैं। यह परंपरा आध्यात्मिक निष्ठा और प्रकृति के प्रति आभार का अद्भुत संगम है।
मंत्र / श्लोक: येन बद्धो बली राजा दानवेन्द्रो महाबलः। तेन त्वामपि बध्नामि रक्षे मा चल मा चल॥
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