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कस न दीनपर द्रवहु उमाबर 007

भजन कुसुमाञ्जलि | Bhajan Kusumanjali

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कस न दीनपर द्रवहु उमाबर 007

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भजन कुसुमाञ्जलि | Bhajan Kusumanjali
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तुलसीदास ( विनय पत्रिका ) कस न दीनपर द्रवहु उमाबर । दारुन बिपति हरन करुनाकर ॥ १ ॥ बेद-पुरान कहत उदार हर । हमरि बेर कस भयेहु कृपिनतर ॥ २ ॥ कवनि भगति कीन्ही गुननिधि द्विज । होइ प्रसन्न दीन्हेहु सिव पद निज ॥ ३ ॥ जो गति अगम महामुनि गावहिं । तव पुर कीट पतंगहु पावहिं ॥ ४ ॥ देहु काम-रिपु! राम - चरन - रति । तुलसिदास प्रभु! हरहु भेद-मति ॥ ५ ॥ भावार्थ- हे उमा रमण ! आप इस दीनपर कैसे कृपा नहीं करते ? हे करुणाकी खानि ! आप घोर विपत्तियोंके हरनेवाले हैं ॥ १ ॥ वेद-पुराण कहते हैं कि शिवजी बड़े उदार हैं, फिर मेरे लिये आप इतने अधिक कृपण कैसे हो गये?॥२॥ गुणनिधि नामक ब्राह्मणने आपकी कौन-सी भक्ति की थी, जिसपर प्रसन्न होकर आपने उसे अपना कल्याणपद दे दिया ॥ ३ ॥ जिस परम गतिको महान् मुनिगण भी दुर्लभ बतलाते हैं, वह आपकी काशीपुरीमें कीट- पतंगोंको भी मिल जाती है ॥ ४ ॥ हे कामारि शिव ! हे स्वामी !! तुलसीदासकी भेद - बुद्धि हरणकर उसे श्रीरामके चरणोंकी भक्ति दीजिये ॥ ५ ॥