सत्य ज्ञान का आदिमूल कौन? | आर्य समाज का प्रथम नियम | Arya Samaj First Principle
Akhilesh Bharti – जीवन संवाद
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सत्य ज्ञान का आदिमूल कौन? | आर्य समाज का प्रथम नियम | Arya Samaj First Principle
40 просмотров · 16 ч назад
Akhilesh Bharti – जीवन संवाद
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यह वीडियो “आर्य समाज क्या मानता है?” शृंखला का भाग–2 है। शृंखला के पहले भाग में हमने आर्य समाज की स्थापना और उसकी मान्यताओं के आठ मूल स्तंभों का संक्षिप्त परिचय प्राप्त किया था। इस भाग में हम आर्य समाज के प्रथम नियम को विस्तार से समझने का प्रयास करेंगे।
आर्य समाज का प्रथम नियम है—
“सब सत्य विद्या और जो पदार्थ विद्या से जाने जाते हैं, उन सबका आदिमूल परमेश्वर है।”
इस नियम में प्रयुक्त ‘सत्य विद्या’, ‘पदार्थ’ और ‘आदिमूल’ शब्दों का वास्तविक अर्थ क्या है? परमेश्वर सत्य ज्ञान का आदिमूल कैसे है? क्या वैज्ञानिक ज्ञान और आध्यात्मिक ज्ञान एक-दूसरे के विरोधी हैं? मनुष्य सत्य का निर्माता है या खोजकर्ता?
इस वीडियो में इन प्रश्नों पर सरल उदाहरणों और वैदिक प्रमाणों के माध्यम से विचार किया गया है।
प्रथम नियम का अर्थ यह नहीं है कि प्रत्येक आधुनिक आविष्कार का पूरा विवरण वेदों में पहले से लिखा हुआ है। इसका भाव यह है कि सत्य, प्राकृतिक नियम, सृष्टि के पदार्थ, मनुष्य की ज्ञान-क्षमता और सृष्टि के आरम्भ में प्राप्त मूल ज्ञान का अंतिम आधार परमेश्वर है।
मनुष्य सत्य का निर्माता नहीं, अन्वेषक है; और उस सत्य, सृष्टि-व्यवस्था तथा ज्ञान-क्षमता का आदिमूल परमेश्वर है।
This is Part 2 of the “What Does Arya Samaj Believe?” video series. This episode explains the First Principle of Arya Samaj: God is the ultimate source of all true knowledge and of everything known through knowledge.
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ओ३म्। नमस्ते जी।
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