द्रौपदी के स्वयंवर में कर्ण जीता या हारा क्या कहती है महाभारत - Story Of Mahabharat
Amit Aryavart
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द्रौपदी के स्वयंवर में कर्ण जीता या हारा क्या कहती है महाभारत - Story Of Mahabharat
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द्रौपदी के स्वयंवर में कर्ण जीता या हारा क्या कहती है महाभारत - Story Of Mahabharat महाभारत का सबसे बडा झूठ,
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अक्सर आपने कुछ असुर बुद्धि वालो को ये बूते हुए अपनी छाती पीट पीट कर विधवा विलाप करते हुए देखा होगा की द्रोपदी के स्वेवंवर में कर्ण को सूत पुत्र बोलकर उसे स्वेवंवर में भाग नही लेने दिया
देखिए महाभारत में क्या लिखा है
इदं सज्यं धनुः कृत्वा सजैरेभिश्च सायकैः । अतीत्य लक्ष्यं यो वेद्धा स लब्धा मत्सुतामिति ॥११॥
अर्थ-द्रुपद ने यह प्रतिज्ञा की कि जो पुरुष इस धनुष को चढ़ा के इन्हीं बाणों को उसमें लगाकर इस लक्ष्य को बींधेगा वही मेरी पुत्री को वरेगा |
इस प्रतिज्ञा को पढ़ कर हम अनुमान लगा सकते हैं की कोई भी वीर किसी भी वर्ण का हो वो इस
स्वेवंवर में भाग ले सकता था
अब आगे पढ़िए क्या लिखा है
तानेवमुक्त्वा द्रुपदस्य पुत्रः पश्चादिदं ता भगिनीमुवाच । नाम्ना च गोत्रेण च कर्मणा च संकीर्त्तयन् भूमिपतीन् समेतान् ॥३४॥
अर्थ-द्रुपद का पुत्र धृष्टद्युम्न उन राजाओं से इस प्रकार कहकर पश्चात् अपनी बहिन को सब राजाओं के नाम, कुल और कर्म इस प्रकार बताने लगा कि :
दुर्योधनो दुर्विषहो दुर्मुखो दुष्प्रधर्षणः । विविंशतिर्विकर्णश्च सहो दुःशासनस्तथा ॥१॥ युयुत्सुर्वायुवेगश्च भीमवेगरवस्तथा । उग्रायुधो बलाकी च कनकायुर्विरोचनः ||२|| कृण्डकश्चित्रसेनश्च सुवर्चाः कनकध्वजः । नन्दको बाहुशाली च तुहुण्डो विकटस्तथा ॥ ३ ॥ एते चान्ये च बहवो धार्त्तराष्ट्रा महाबलाः । कर्णेन सहिता वीरास्त्वदर्थ समुपागताः ॥ ४ ॥
अर्थ-हे द्रौपदी ! दुर्योधन, दुर्विषह, दुर्मुख दुष्पधर्षण. विविंशति. विकर्ण, मह, दुःशासन, वायु के समान वेग और भयानक शब्द करने वाला युयुत्सु, उग्रायुध, बलाकी, कनकायु, विरोचन, कुण्डक, चित्रसेन, मुवर्चा, कनकध्वज, बाहुशाली नन्द्रक, तुहुण्ड और विकट, यह महायली धृतराष्ट्र के वीर पुत्र तथा अन्य बहुत से राजा “कर्ण" सहित यहां तेरे लिये आये हैं ।।
आगे ओर भी अनेकों राजाओं के नाम लिखे हैं वो आप महाभारत में पढ़ लेना अब ये देखिए यहां कर्ण का नाम भी है
अब आगे देखिए क्या लिखा है
ततस्तु ते राजगणाः क्रमेण कृष्णानिमित्तं कृतविक्रमाश्च । सकर्णदुर्योधनशाल्वशल्य दौणायनिकाथसुनीथ वक्राः ॥ ११ ॥ कलिंगवंगाधिपपाण्ड्यपौण्ड्राविदेहराजो यवनाधिपश्च । अन्ये च नानानृपपुत्र पौत्राः राष्ट्राधिपः पंकजपत्रनेत्राः ||१२|| किरीटहारांगदचक्रवालैर्विभूषितांगाः युवाहवस्ते । अनुक्रमं विक्रमसत्त्व युक्ताः बलेन वीर्येण च नर्दमानाः ||१३|| तत्कार्मुकं संहननोपपन्नं सज्यं न शेकुर्म नसापि कर्तुम् । ते विक्रमन्तः स्फुरता दृढेन विक्षिप्यमाना धनुषा नरेन्द्राः ॥१४॥
अर्थ-तब वह राजा लोगों के समुदाय जिनमें कर्ण, दुर्योधन, शाल्व, शल्य. द्रोणाचार्य का पुत्र क्राय, सुनीय, वक्र, कलिङ्ग देश का राजा, बंग देश का राजा, पाड्य देश और पुण्ड्रदेश के राजा, मिथिला का राजा, यवनराज तथा अन्य बहुत से भिन्न २ राजाओं के पुत्र पौत्र द्रौपदी को वरने के लिये पराक्रम दिखलाने वाले थे तथा जो अनेक देशों के स्वामी कमलपत्र जैसे नेत्रों वाले, मुकट, हार. अगद, चक्रवाल इन आभूषणों से भूषित अङ्गों वाले, महाबाहु, एक दूसरे से बढ़ चढकर पराक्रम तथा उत्साह सम्पन्न थे, उनमें से बहुत से राजा अपने बल तथा पराक्रम से गर्जते हुए एक एक धनुष के उठाने का यत्न करने लगे, परन्तु उस महाकठोर धनुष की फड़क न सहारसके और फिर मलिन चित्त हुए उन राजाओं ने धनुष चढ़ाने का पुनः मन में संकल्प भी न किया ॥
यहां पर कर्ण समेत अनेकों राजा उस धनुष के साथ अपना बल दिखा चुके परंतु किसी को सफलता नही मिली
अब देखिए आगे वो मिलावटी श्लोक है इसे भी पढ़ लीजिए
सर्वान्नृपांस्तान् प्रसमीक्ष्य कर्णो धनुर्धराणां प्रवरो जगाम । उद्धृत्य तूर्ण धनुरुद्यतं तत् सज्यं चकाराशु युयोज बाणान् ॥ १७ ॥ दृष्ट्वा सूतं मेनिरे पाण्डुपुत्रा भित्त्वा नीतं लक्ष्यवरं धरायाम् । दृष्ट्वा तुतं द्रौपदी वाक्य मुचैर्जगाद नाहं वरयामि सूतम् ।। १८ ।।
अर्थ-तब धनुर्धारियों में श्रेष्ठ कर्ण उन सब राजाओं को उत्साह हीन देखकर धनुष के समीप गया और शीघ्रता से उस धनुष को उठा तुरन्त ही उसमें चिल्ला चढ़ाकर बाण लगा दिये, जब उसने उस उत्तम लक्ष्य को बींधकर पृथ्वी पर गिराया तो पाण्डवों ने उसको सूतपुत्र कर्ण समझ लिया, परन्तु द्रौपदी ने उसको देखते ही ऊंचे स्वर से कहा कि मैं सूत को नहीं वरुंगी ॥
देखिए ये झूठ बीच में डाला गया है इसका आपको अगले श्लोक से भी ज्ञान हो जाएगा
यत् कर्णशल्यप्रमुखैःक्षत्रियैर्लोकविश्रुतैः । नानतं बलवद्धिर्हि धनुर्वेदपरायणैः ॥ ४ ॥ तत् कथं त्वकृतास्त्रेण प्राणतो दुर्बलीयसा । वमात्रेण शक्यं हि सज्यं कर्तुं धनुर्द्विजाः ॥ ५ ॥
अर्थ-जिस धनुष को शस्त्रविद्या में निपुण तथा बलवान् कर्ण. शल्य आदि लोकविख्यात राजा नहीं चढ़ासके वह धनुष • बल से हीन तथा अस्त्रविद्या के न जानने वाले इस ब्राह्मण से कैसे चढ़ाया जासकता है।
इसमें साफ साफ आया है की कर्ण ने प्रयास किया था परंतु वो विफल रहा
अब आप समझ ही गए होंगे की महाभारत में मिलावट कैसे की गई है
दोस्तो महाभारत पढ़ो तभी सत्य अस्तय की जानकारी होगी
जय श्रीराम 🙏 मित्रो आशा करता हूं इसे पढ़ कर आपको आनंद आया होगा मुझे तो बहुत आनंद आ रहा है महाभारत पढ़कर