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भगवद्गीता - षष्ठ अध्याय श्लोक 42-47 #gita #geeta #bhagavadgita #vyash #mahabharat #youtubevideo

DR. SATYENDU SHARMA

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भगवद्गीता - षष्ठ अध्याय श्लोक 42-47 #gita #geeta #bhagavadgita #vyash #mahabharat #youtubevideo

29 просмотров · 13 дн. назад
DR. SATYENDU SHARMA
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भगवद्गीता - षष्ठ अध्याय के श्लोक 42-47 तक में भगवान् श्रीकृष्ण ने निमनलिखित महत्त्वपूर्ण बातें समझायी हैं - योगभ्रष्ट साधक बुद्धिमान् योगियों के ही कुल में जन्म लेता है । वहाँ योगियों के कुल में उत्पन्न होकर वह पूर्वजन्म के शरीर से संबंधित उस बुद्धि के संयोग को प्राप्त करता है और उससे आगे फिर से परमात्म-प्राप्ति रूप योग- सिद्धि के लिए प्रयत्न करता है । प्रयत्नपूर्वक अभ्यास करनेवाला योगी तो समस्त पापों से पूरी तरह शुद्ध होकर, अनेक जन्मों के संस्कार से सिद्ध होकर फिर तत्काल ही परम गति को प्राप्त होता है । योगी तपस्वियों से श्रेष्ठ है, ज्ञानियों से भी अधिक श्रेष्ठ है और कर्मयोगियों से भी श्रेष्ठ है, इसलिए हे अर्जुन ! तुम सभी प्रकार से योगी बनो । समस्त योगियों में भी जो श्रद्धालु योगी मुझमें निरन्तर अंतःकरण से जुड़ा हुआ रहते हुये मेरा भजन करता है, वह योगी मुझे सबसे अधिक श्रेष्ठ मान्य है ।