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तुम्हारे अस्तित्व का मूल क्या है? | अष्टावक्र गीता 2.6 | ‪@MokshaMarg-18‬

Moksha Marg 18

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तुम्हारे अस्तित्व का मूल क्या है? | अष्टावक्र गीता 2.6 | ‪@MokshaMarg-18‬

116 просмотров · 9 дней назад
Moksha Marg 18
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क्या यह पूरा संसार वास्तव में तुमसे अलग है? अष्टावक्र गीता अध्याय 2 के श्लोक 6 में एक अत्यंत गहरी अद्वैत दृष्टि सामने आती है। यथैव इक्षुरसे क्लृप्ता तेन व्याप्तैव शर्करा। तथा विश्वं मयि क्लृप्तं मया व्याप्तं निरन्तरम्॥ २-६॥ इस श्लोक में गन्ने के रस और चीनी के उदाहरण से यह समझने की दिशा दी जाती है कि जैसे चीनी में मिठास व्याप्त होती है, वैसे ही विश्व और आत्मा के संबंध को कैसे देखा जाए। लेकिन यहाँ सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न है: "मैं" कौन हूँ? क्या मैं केवल शरीर हूँ? क्या मैं मन हूँ? क्या मैं विचार और भावनाएँ हूँ? या वह चेतना हूँ जिसमें ये सभी अनुभव प्रकट होते हैं? इस वीडियो में हम समझेंगे: • "विश्व मुझमें है" का अर्थ • आत्मा और संसार का संबंध • चेतना और अनुभव • अद्वैत वेदांत में एकत्व की दृष्टि • शरीर, मन और पहचान का भ्रम • "साक्षी" की दिशा • आत्मविचार का सरल अभ्यास • सफलता, असफलता, सुख और दुःख को देखने का नया तरीका • आत्मज्ञान में "मैं" की वास्तविक जाँच यह वीडियो अष्टावक्र गीता अध्याय 2 की हमारी श्रृंखला का अगला भाग है। अंत तक बने रहिए, क्योंकि अंत में एक महत्वपूर्ण प्रश्न सामने आएगा: अगर पूरा विश्व आत्मा में प्रकट है, तो फिर बंधन किसे महसूस होता है? #अष्टावक्रगीता #आत्मज्ञान #अद्वैतवेदांत