बृहत् पराशर होरा शास्त्र अध्याय 26 — आत्मकारक एवं चर कारक | Jaimini Chara Karaka Explained
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बृहत् पराशर होरा शास्त्र अध्याय 26 — आत्मकारक एवं चर कारक | Jaimini Chara Karaka Explained
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बृहत् पराशर होरा शास्त्र — अध्याय 26
आत्मकारक एवं चर कारक — जैमिनी दृष्टि का परिचय
क्या आपका गुरु किसी और की कुंडली में जीवनसाथी का कारक बन सकता है?
महर्षि पराशर मैत्रेय को महर्षि जैमिनी की परम्परा से आया एक सर्वथा
नया दृष्टिकोण सिखाते हैं — चर कारक, जो प्रत्येक कुंडली में ग्रह के
अंश के अनुसार बदल जाते हैं। जानिए आत्मकारक (आत्मा का प्रमुख कारक)
क्या है, शेष छह चर कारक कौन-से हैं, और एक सम्पूर्ण उदाहरण के साथ
यह सिद्धांत व्यवहार में कैसे कार्य करता है।
⏱️ अध्याय के प्रमुख भाग (Timestamps):
00:00 परिचय — जैमिनी दृष्टिकोण का प्रवेश
01:26 स्थिर कारक बनाम चर कारक
02:50 आत्मकारक — प्रमुख चर कारक
04:14 आत्मकारक का व्यावहारिक महत्त्व
05:57 शेष छह चर कारक
08:06 नवमांश में आत्मकारक का उपयोग
09:16 सम्पूर्ण उदाहरण — सातों कारक
10:21 समापन एवं अगले अध्याय की झलक
🕉️ यह मूल, स्वरचित कथा-वाचन है — महर्षि पराशर एवं उनके शिष्य
मैत्रेय के संवाद के रूप में — बृहत् पराशर होरा शास्त्र के पारम्परिक
विषयों पर आधारित।
📖 अगला अध्याय (27): भाव बल एवं भावेश का महत्त्व — किसी भाव की
समग्र शक्ति किस प्रकार निर्धारित होती है।
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