प्राचीन ग्रंथों में राधा क्यों नहीं हैं? पुराणों में राधा का छुपा रहस्य| Krishna Radha Mystery-Fact
Divya Jain Dharm
0:00 / 0:00
प्राचीन ग्रंथों में राधा क्यों नहीं हैं? पुराणों में राधा का छुपा रहस्य| Krishna Radha Mystery-Fact
148 просмотров · 1 день назад
Divya Jain Dharm
1,2 тыс. подписчиков
148 просмотров · 1 день назад
लोग अक्सर कहते हैं,
अगर श्रीकृष्ण को प्रसन्न करना है, तो पहले राधा की भक्ति करो, राधा श्रीकृष्ण की प्राणप्रिया हैं, राधा के बिना कृष्ण अधूरे हैं। लेकिन कभी आपने एक बहुत साधारण सा प्रश्न पूछा है? अगर राधा श्रीकृष्ण के जीवन की इतनी महत्वपूर्ण पात्र थीं, तो वेदों में राधा कहा हैं? महाभारत में राधा कहाँ हैं? भगवद् गीता में राधा कहाँ हैं? और सबसे आश्चर्यजनक बात, श्रीमद्भागवत में कृष्ण की रासलीला का इतना विस्तृत वर्णन होने के बावजूद, “राधा” नाम की किसी भी स्त्री का वर्णन क्यों नहीं हैं?
आज राधा को श्रीकृष्ण की सबसे प्रसिद्ध प्रेमिका, उनकी शक्ति और कई वैष्णव परंपराओं में सर्वोच्च देवी तक मानी जाती हैं, उनका यह विकसित स्वरूप भारतीय साहित्य में कब दिखाई देता है?
और क्या कृष्ण की प्राचीन छवि वास्तव में वही थी, जिसे आज हम राधा कृष्ण की प्रेम लीलाओं के रूप में सबसे अधिक जानते हैं?
आज की इस वीडियो में हम किसी की श्रद्धा का खंडन करने नहीं, बल्कि मूल ग्रंथों के आधार पर एक बहुत रोचक प्रश्न की खोज करने जा रहे हैं।
और कुछ प्रमाण शायद आपको सचमुच सोचने पर मजबूर कर देंगे।
सबसे पहले देखते हैं कि प्राचीन साहित्य में कृष्ण का स्वरूप कैसा बताया है?
वेदों के छान्दोग्य उपनिषद् के तीसरे अध्याय के सत्रहवें खंड में एक महत्वपूर्ण उल्लेख आता है, कृष्णाय देवकीपुत्राय। इस श्लोक में देवकी पुत्र कृष्ण ने अंगिरस मुनि से आध्यात्मिक ज्ञान पाया ,ऐसा उल्लेख है, ध्यान दीजिए, यहाँ राधा नहीं हैं, रासलीला नहीं है, गोपियों के साथ प्रेमलीला का वर्णन भी नहीं है, वेदों में श्रीकृष्ण का जिक्र मात्र आध्यात्मिक ज्ञान से संबंधित है।
इसके बाद जब हम महाभारत में आते हैं, तो वहां श्री कृष्ण अर्जुन के सारथी हैं, नीति और धर्म पर संवाद करने वाले ज्ञानी हैं। कर्मयोग, ज्ञानयोग, भक्तियोग और आत्मसंयम का उपदेश देने वाले गुरु हैं।
और भगवद् गीता के अंतिम श्लोक में उनके लिए अत्यंत स्पष्ट शब्द आता है, “यत्र योगेश्वरः कृष्णो, यत्र पार्थो धनुर्धरः।” इस श्लोक में स्पष्ट रूप से श्रीकृष्ण को योगेश्वर माना हैं, योगेश्वर यानी जिनका भोग से कोई संबंध ना हों। अब जैन परंपरा की ओर आइए, जैन ग्रंथों में भी श्री कृष्ण को अपार पुण्य के कारण तीन खंडों के महाराजा माना गया है। वे यादव वंश के महान शक्तिशाली राजपुरुष हैं और बाईसवें तीर्थंकर भगवान अरिष्टनेमि, अर्थात् नेमिनाथ, के चचेरे भाई हैं।
जैन ग्रंथ में श्रीकृष्ण के विवाह, परिवार, युद्ध और राजकीय जीवन का वर्णन मिलता है। लेकिन साथ ही तीर्थंकर अरिष्टनेमि से ज्ञान प्राप्ति का भी उल्लेख हैं, श्रीकृष्ण ने अपने सो पुत्रों को भगवान अरिष्टनेमि के पास संन्यास लेने के लिए प्रेरित किया था, सभी ने संन्यास लिया और मोक्ष प्राप्त किया। दोस्तों, ये तीर्थंकर अरिष्टनेमि वे ही हैं जिनकी वेदों के स्वस्ति मंत्र स्वस्ति मा इंद्रों, अरिष्टनेमि में स्तुति की गई है। अब बात करते हैं सबसे महत्वपूर्ण प्रमाण की, भागवत महापुराण। इसके दशम स्कंध के अध्याय उनतीस से तैंतीस तक प्रसिद्ध रास-पंचाध्यायी है। यहाँ कृष्ण और गोपियों की रासलीला का विस्तार पूर्वक वर्णन मिलता है।
लेकिन अब ध्यान से सुनिए।
रासलीला के बीच एक विशेष गोपी का प्रसंग आता है, गोपियाँ कृष्ण को खोज रही हैं, उन्हें कृष्ण के पदचिह्न दिखाई देते हैं, और उन्हीं पदचिह्नों के साथ उन्हें एक दूसरी स्त्री के पदचिह्न भी दिखाई देते हैं। तब गोपियाँ कल्पना करती हैं कि कृष्ण किसी विशेष गोपी को अपने साथ एकांत में ले गए होगे।
और फिर तीसवे अध्याय के अट्ठाइसवें श्लोक में उस विशेष गोपी के लिए शब्द आता है, अनयाराधितो नूनं भगवान् हरिरीश्वरः। इसका अर्थ है कि इस गोपी ने भगवान हरि की विशेष आराधना की होगी। अब सबसे महत्वपूर्ण बात। इस श्लोक में “राधा” नाम नहीं है, मूल पाठ में शब्द है , आराधित , यानी की आराधना की होगी, बाद मे इसी आराधित शब्द में से राधी शब्द निकाल कर बाद की टीका परंपराओं में एक प्रेमिका के रूप में राधा नाम का स्त्री पात्र जोड़ा गया।
इसी समय भारत में पौराणिक काल शुरू हुआ, इस काल में रचित ब्रह्मवैवर्त पुराण में राधा को और भी महान शक्ति तथा देवी का स्थान दिया गया। फिर बारहवीं सदी में कवि जयदेव ने अपनी रचना को श्रृंगार रस से भरने के लिए कृष्ण राधा की प्रेम कथाओं की प्रभावशाली काव्य रचना की, जिसका नाम था गीत गोविंद, इस रचना से पुरे भारत में कृष्ण राधा प्रेम कथाएं फैलने लगी। अब जैन परंपरा की एक रोचक बात देखिए।
जैन धर्म में आज भी श्री कृष्ण की आठो महारानियां रुक्मिणी, सत्यभामा, जाम्बवती, कालिंदी, मित्रविंदा, सत्या, भद्रा, लक्ष्मणा को महान् सतियो के रूप में रोज सुबह प्रतिक्रमण में भरहेसर सूत्र में याद किया जाता है। जैन धर्म में श्री कृष्ण को भोगी, रासलीला करने वाले नहीं, बल्कि आध्यात्मिक ज्ञानी और महान राजा के रूप में याद किया जाता है। इस वीडियो का उद्देश्य किसी की श्रृद्धा का खंडन करना नहीं हैं, बल्कि प्रमाणों को साक्ष्य रखकर सिर्फ इतना ही कहना हैं कि श्रीकृष्ण में जो योगी, ज्ञानी पुरुष के गुण थे उन गुणों को हमें अपनाना चाहिए , उन्हें एक भोगी, रासलीला करने वाले की छवि के रु
प में बहुत बाद में चित्रित किया गया, जो शायद श्री कृष्ण का वास्तविक रूप नहीं हैं। दोस्तों, हमारे द्वारा बनाई गई ज्ञानवर्धक विडियो यदि आपको पसंद आ रहीं हैं तो कृपया चैनल को सब्सक्राइब जरूर करें, और कृपया विडियो को लाइक, शेयर और कमेंट भी जरूर करें, ताकि यह विडियो हर भारतीय तक पहुंच सके। धन्यवाद। #jaindharm #jainreligion #jaincommunity #jaindharma