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देवी ने किया सु साइड|देवी दुर्गा की अन्तिम कथा 7

JAGO PANCH

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देवी ने किया सु साइड|देवी दुर्गा की अन्तिम कथा 7

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देवी ने किया सु साइड|देवी दुर्गा की अन्तिम कथा 7 मूल निवासियों को लगातार मौत हीं मौत देते रहने से मैं देवी बन गई. मौत देने वाली देवी. पुरुष वर्ग 'देवता' कितीन मौतें हुई? कितनी हत्याऐं हुई? ऐसा हिसाब मांगते-मांगते 'देवता' बन गए. इनके तमाम अनुचर देवगण हो गए. जो मूल निवासी बहुजनों को कहते हैं - कर्मण्ये वाधिकारस्तु, मा फलेषु कदाचन." कर्म करते रहो. पूरी ईमानदारी और निष्ठा से करो. पर, फल की आशा से नहीं करो. निस्वार्थ भाव से हमारी सेवा करो. हम तुम्हें स्वयं देंगे तुम्हारी सेवा का फल. हम तुम्हें मोक्ष देंगे. स्वर्ग में स्थान देंगे. यही देने के आश्वासन का नाम है 'देव'. देव मैथिली शब्द है. देव यानि देंगे. पर अभी नहीं, तुम्हारे मरने के बाद. आज इन्हीं देवों की सहचरी देवी कही जाती हैं. एक दिन ये तमाम परिस्थितियाँ, तमाम घटनाएँ मेरे अन्तर मन को कुरेदने लगी. मेरे अन्तर्द्वन्द की आवाज आई अब कितनों को मौत देगी? कितनी हत्याएँ करेगी ? ८५% लोग तो तुम्हारे गुलाम हो चुके हैं. उनकी अपनी पहचान खो चुकी हैं. उनकी अपनी सभ्यता और संस्कृति विलीन हो गई. तुम्हारी सभ्यता और संस्कृति में. वे तो मुख्य धारा से अलग हो चुकें है. अब उन्हें जगाना, जगाकर जोड़ना, जोड़कर संगठित करना, संगठित कर मुख्य धारा में शामिल करने के लिए आन्दोलन की प्रेरणा देने वाला कोई बचा ही नहीं है. जो बचा है वह बिक चुका है. वृषभ बनकर बैल पर ही संवार है. अशिक्षित है, अर्द्धनग्न है. उनकी सहचरी (पत्नी) को नग्न (निर्वस्त्र) कर बीच चौराहे पर खड़ा कर दिया है. नाम दे दिया है 'महाकाली. ८५% लोग उसी नारी को माँ कहने के लिए बाध्य हैं. उनकी सोच मर चुकी है. जिसका एक मात्र कारण है अज्ञानता, अशिक्षा. इस अज्ञानता और अशिक्षा का कारण हैं - देव और देवियाँ. शिखा सूत्र और टीका-चन्दन वाले लोग. जो पूरे जनसंख्या का मात्र तीन प्रतिशत हैं. पर हैं संगठित ! संगठित रहने का कारण है - रोजी-बेटी का सम्बन्ध. यह सम्बन्ध व्यवस्था तो आपका था, जिसे भूदेव ब्राह्मणों ने आपसे छीन लिया है. आज भी जो मूल निवासी जंगलों में छिपे हैं उनके पास यह व्यवस्था सुरक्षित है. उसी रूप में फूल-फल रही है. हे, मूल निवासी बहुजनों, यह मेरे अन्तर्द्वन्द की आवाज थी. इसी आवाज ने कहा - "अब तुम्हें जीने का कोई औचित्य नहीं है. ये तीन प्रतिशत लोग ही तुम्हें जीने नहीं देंगे. उनका काम हो गया. वे अब तुम्हें हत्या करेंगे और तुम्हारी लाश (प्रतिमा) ८५% लोगों के बीच खड़ा कर तुमसे भीख मंगवाते रहेंगे. यही विष्णु पुराण का अंतिम अध्याय है. इस आवाज ने मेरे अन्तर मन को झकझोरा और मैंने आत्महत्या करने का निर्णय ले लिया. इसी निर्णय को लेकर मैं सरस्वती के पास गई. वह उदास बैठी थी. मुझे देखते ही वह उठकर मेरे गले से लिपट गई. फूट-फूट रोने लगी. रोते हुए ही उसने कहा- मेरी प्यारी अमृते, संगीत जो जीवन है. पर मेरा संगीत मूल निवासियों के मौत का पैगाम है. मुझे जीने का कोई हक नहीं. मैं वहीं जा रही हूँ जहाँ महिषासुर गए हैं. इतना कहते ही सरस्वती मेरे बाँहों में लुढ़क गई. नीचे देखा, तो जहर का प्याला खाली था. वहीं एक कागज का टुकड़ा था, जिसपर लिखा था मेरी प्यारी सरस्वती और दुलारी अमृता. मेरी नारी हृदय रो रहा है. अब मैं सदा के लिए अंतिम विदा लेती हूँ तुम्हारी लक्ष्मी. #देवी_दुर्गा_की_अंतिम_कथा7 #विष्णु #विष्णु_पुराण #विष्णुपुराण #देवी_दुर्गा #महिषासुरमर्दिनी #महिषासुर #अचल_सिद्धार्थ_यादव #जागो_पंच #दुर्गा #दुर्गा_पूजा #सरस्वती #लक्ष्मी