राजा महिषासुर को कैसे मारा गया|देवी दुर्गा की आत्मकथा 6
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राजा महिषासुर को कैसे मारा गया|देवी दुर्गा की आत्मकथा 6
महिषासुर को कैसे मारा
महिषासुर के महान सेना नायक चिक्षुर, उदग्र, असिलोमा, चण्ड- मुण्ड आदि महान पराक्रमी वीरों को हम नौ दुर्गाओं ने अपने मायाजाल में फँसाकर मार डाला. इनकी मौत पर महिषासुर अत्यन्त क्रोधित और आश्चर्चित हुआ. उसने सोचा हमारे कुल की औरतें भी युद्ध के मैदान में जाती हैं. अपना रण कौशल दिखाती हैं और विजयी भी होती हैं पर ये औरतें तो बिना अस्त्र- शस्त्र की हैं. सुना है कुछ औरतें बिल्कुल नग्न हैं. अपने अंग-प्रत्यंग का खुला प्रदर्शन करती हैं. यह तो युद्ध की कोई कला नहीं है. उनके पुरुष वर्ग सभी के सभी हिजरे हैं. इन्द्र तो राजा था पर मेरे एक ही झटके में धरती पकड़ लिया.
मलद और करूप जो आज का आरा और छपड़ा है वहाँ का बहुजन एक बार इसे पकड़ कर पाखाने के एक कुण्ड में डाल दिया था. शिखा - सूत्र वालों ने किसी तरह निकाला, तब इसकी जान बची. एक विष्णु है जो मोहिनी बनता है. मूल निवासियों को ठगता है. फिर कौन सी ताकत है उसके पास ? जिसके बल-बुते पर टिड्डी के तरह फैलते जा रहे है. रात भर महिषासुर यही सोचते रहा, सोने का प्रयत्न भी किया, पर आँखों में नींद नहीं आई. यही क्रम महीनों चला रहा. ठीक तीन महीने बाद प्रातः चार बजे उसे मधुर संगीत सुनाई पड़ा. ऐसी संगीत उसने कभी सुना नहीं था. वह घबड़ाकर उठ गया. इधर-उधर देखा, पर कहीं भी उस स्वर का संकेत नहीं मिला. महल के छत पर जाकर देखा तो वह मधुर स्वर उद्यान के बीच सरोबर के तट से आ रही थभ. संगीत में इतना आकर्षण था कि वह अपने आपको भूल गया. महल से उतर कर अकेले चल पड़ा उस सरोबर की ओर. देखा, श्वेत वस्त्र पहनी एक युवती संगीत के स्वर में खोई है. वेसुध है. बिल्कुल निडर है. किसी के न आने की परवाह है और न किसी के जाने की. महिषासुर एक टक लगाकर उस संगीतमयी सुन्दरी को घंटो देखता रहा. संगीतमयी वाला अपनी आँख उठाकर देखा भी नहीं. महिषासुर के जीवन में यह पहला दिन था कि उसने ऐसी जीवन्त मूर्त्तिमयी वाला के अपलक देख रहा था. कुछ क्षण बाद वह घुठने के बल बैठ गया. वाला की आँखें महिषासुर की आँखों से टकरा गई. संगीत रूख गया और वह वाला भागने का प्रयत्न करने लग गई. महिषासुर ने
रास्ता रोक कर रूकने का निवेदन किया. वाला रूक गई और धीरे से कहा "मुझे डर लगता है. यह छोटा सा उत्तर महिषासुर के रोम रोम में समा गया. वह उसने अपने बाहुपास में बाँध लेना चाह रहा था पर उसे हिम्मत नहीं हुई. वह वाला कोई साधारण वाला नहीं थी. स्वयं ब्रह्मा की पुत्री सरस्वती थी. प्रकृति की अनमोल रचना थी.
"आप मुझे जाने दें, मेरी सहेली सामने वाले उपवन की शोभा देख रही है और मेरी प्रतीक्षा भी कर रही है." सरस्वती ने अपनी आँखें झुका कर कहा.
"क्या आप मुझे भी उस उपवन तक साथ चलने की अनुमति नहीं देगी" महिषासुर ने निवेदन किया.
"क्षमा करें महानुभाव. आपकी सुन्दरता मेरी सहेलियों को लुभा लेगी. फिर मैं अकेली हो जाऊँगी." आँचल सम्भालते हुए सरस्वती ने कहा.
"ऐसा कभी नहीं होगा. आप मुझ पर भरोसा करें." महिषासुर ने मुस्कुराकर कहा.
आगे-आगे सरस्वती और पीछे महषासुर. मात्र पचास कदम चलने पर महिषासुर ने देखा, एक वाला लाल चुनर पहन कर नृत्य कर रही है. उसके पास ही मधुकलश लिए दूसरी वाला उसे निहार रही है और मुस्कुरा भी रही है.
सरस्वती फूलों से लदे एक पेड़ के पास खड़ी हो गई. पर महिषासुर अपलक दृष्टि से उस नृत्य करती वाला को देखते हुए आगे बढ़ गया. महिषासुर के देखते ही नृत्य करती हुई वाला के पाँव रूक गए. आँखें झुक गई. दूसरी वाला जो मधुकलश लिए थी वह नृत्यांगना के गले में बाँह डाल कर लिपट गई. सरस्वती ने आगे बढ़कर कहा "आखिर आपने मेरी सहेलियों को डरा हीं दिया."
"तो दीजिए सजा, जो आप उचित समझती हैं." - सिर झुकाकर महिषासुर ने कहा. दोनों सहेलियाँ मुस्कुराकर आँखे झुका ली. सरस्वती की इन दो सहेलियों में एक थी लक्ष्मी और दूसरी मैं देवी दुर्गा.
महिषासुर के अनुरोध पर हम तीनों उनकें ही साथ आतित्थ्यशाला में पहुँच गई. हम सबों का राजकीय सम्मान किया गया. विश्राम के पश्चात घड़ी देखा तो शाम के चार बज चुके. हम सभी सोलह श्रृंगार कर अपने-अपने आसन पर बैठ गई, सरस्वती वीणा बजाने लगी. वीणा के झंकार ने महिषासुर को बुला लिया. मेरे अनुरोध पर अंगरक्षकों को छुट्टी कर दी गई. सभी दरवाजे बंद कर दिए गए. संगीत और नृत्य का समा बँध गया. मेरे पाँव को जैसे जादू लग गया हो. घुँघरू बचते रहे ओर मैं वीणा के झंकार पर नाचती रही. लक्ष्मी बीच बीच में मधुकलश का मधु महिषासुर को पिलाती रही. मेरे नृत्य और नयनवाण से महिषासुर पूर्णतः आहत हो गया. वह भूल गया अपने आपको. वह अपने आसन से उठा और मुझे अपने गोद में उठा कर ले गया फूलों सेसुसज्जित अपने पलंग पर. आलिंगन और चुम्बन से मुझे भी मदहोश कर दिया. छाती से छाती, जाँघ से जाँघ, प्रत्येक अंग से अंग ऐसा चिपक गया जैसे पूरे के पूरे महिषासुर मुझमें समा गया हो. सुबह हुई, देखा तो महिषासुर मर चुका है. लक्ष्मी ने विष्णु को सूचित किया. ब्रह्मा और विष्णु चुनिन्दे सैनिकों के साथ आ गए. इन्द्र को मुक्त कर दिया गया. विष्णु के आदेश से मरे हुए महिषासुर की गर्दन काट कर मुख्यद्वार पर लटका दिया. इन्द्र ने महिषासुर के दुर्ग पर लहराता हुआ झण्डा उतार कर अपना विजय पताका लगा दिया. हम सभी नौ दुर्गाऐं अपने-अपने स्थान पर चली गई.
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