utparivartan | Mutation Theory (उत्परिवर्तनवाद)| utparivartan ka siddhant | biology science sk
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उत्परिवर्तनवाद (Mutation Theory)
सर्वप्रथम सन् 1901 में हॉलैण्ड के वनस्पतिशास्त्री ह्यूगो डी ब्रीज (Hugo de Vries) ने उत्परिवर्तनवाद प्रस्तुत किया। उन्होंने सर्वप्रथम उत्परिवर्तन को ईवनिंग संध्या प्रिमरोज (Evening primrose: Oenothera lamarckiana) नामक पौधे में देखा। ईवनिंग प्रिमरोज के पौधों से कुछ ऐसे पौधे उत्पन्न हुए जो अपने जनक पौधों से बिल्कुल भिन्न थे। ऐसे पौधों को उत्परिवर्ती कहते हैं। इस प्रकार लक्षणों में आकस्मिक रूप से होने वाली वंशागत भिन्नताएँ ही उत्परिवर्तन (Mutation) कहलाती हैं। इन पौधों को कई पीढ़ियों तक उगाकर देखा गया और पाया गया कि इनकी सन्तानों में भी उत्परिवर्ती पौधों की भाँति समान गुण थे। उत्परिवर्तन आनुवंशिक होते हैं तथा इनके द्वारा नई-नई जातियाँ बनती हैं। ह्यूगो डी ब्रीज के अनुसार, उत्परिवर्तन जैव विकास की मूल सामग्री है, जो समय-समय पर जीव में अचानक प्रदर्शित होकर सामने आ जाती है। टी.एच.मोर्गन (T.H. Morgan, 1909) ने फलमक्खी (Fruitfly-Drosophila) में विभिन्न उत्परिवर्तनों का अध्ययन किया।
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