क्यों देवता भी मनुष्य जन्म पाने के लिए तरसते हैं....
Shyam Mujavadiya Kavya Bhakti Channel
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भागवत पुराण में बार-बार यह भाव आता है कि मानव जीवन अत्यंत दुर्लभ है और इसे केवल इंद्रिय-सुख में नष्ट नहीं करना चाहिए।
श्रीमद्भागवत 11.9.29 में मानव जन्म की महत्ता बताते हुए कहा गया है कि मनुष्य शरीर अत्यंत दुर्लभ है और इसे प्राप्त करके व्यक्ति भगवान की प्राप्ति का प्रयास कर सकता है।
इसलिए बात केवल इतनी नहीं है कि “देवता मनुष्य बनना चाहते हैं।”
सही आध्यात्मिक अर्थ यह है:
“देवत्व भी अंतिम लक्ष्य नहीं है; भगवान की प्राप्ति अंतिम लक्ष्य है। और मनुष्य शरीर उस लक्ष्य तक पहुँचने का एक अत्यंत दुर्लभ अवसर है।”
इसलिए मनुष्य जन्म को केवल खाने, कमाने, सोने और भोगने में समाप्त कर देना भागवत दृष्टि से इस दुर्लभ अवसर का सदुपयोग नहीं है।
एक गहरी पंक्ति:
“जिस मनुष्य शरीर को पाकर देवता भी साधना का अवसर चाहते हैं, उसी शरीर को हम संसार के छोटे-छोटे सुखों में व्यर्थ कर देते हैं।”