पितृ मुक्ति महामंत्र: पूर्वजों की आत्मिक शांति और घर में सुख-समृद्धि का मार्ग
दिव्य स्पंदन (DEVINE VIBRATION)@UNIVERSE
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पितृ मुक्ति महामंत्र: पूर्वजों की आत्मिक शांति और घर में सुख-समृद्धि का मार्ग
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दिव्य स्पंदन (DEVINE VIBRATION)@UNIVERSE
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पितृ पक्ष या विशेष अवसरों पर अपने पूर्वजों की आत्मिक शांति के लिए जल, तिल और कुश अर्पित करने की यह प्राचीन परंपरा हमारे जीवन में पितृ दोष को दूर करती है और उनका आशीर्वाद प्राप्त कराती है।
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1. मंगलाचरण (प्रारंभिक श्लोक)
ॐ देवताभ्यः पितृभ्यश्च महायोगिभ्य एव च।
नमः स्वाहायै स्वधायै नित्यमेव नमो नमः॥
ॐ पितृभ्यः शान्तिः। ॐ पितृभ्यः नमः।
भावार्थ: सभी देवताओं, महान पितरों और योगियों को हमारा बार-बार नमस्कार हो। हविष्य स्वीकार करने वाली देवी 'स्वाहा' और पितरों को तृप्त करने वाली देवी 'स्वधा' को हम नित्य प्रणाम करते हैं। हे पितृगण! आपको शांति मिले और आपको हमारा बार-बार प्रणाम है।
2. श्रीमद्भगवद्गीता - अध्याय 7, श्लोक 19
बहूनां जन्मनामन्ते ज्ञानवान्मां प्रपद्यते।
वासुदेवः सर्वमिति स महात्मा सुदुर्लभः॥
भावार्थ: बहुत जन्मों के अंत के जन्म में तत्वज्ञान को प्राप्त ज्ञानी पुरुष सब कुछ भगवान वासुदेव (कृष्ण) ही हैं—ऐसा समझकर मेरी शरण में आता है। ऐसा महात्मा अत्यंत दुर्लभ होता है।
3. श्रीमद्भगवद्गीता - अध्याय 15, श्लोक 7
ममैवांशो जीवलोके जीवभूतः सनातनः।
मनःषष्ठानीन्द्रियाणि प्रकृतिस्थानि कर्षति॥
भावार्थ: इस संसार में जीव रूप में आत्मा मेरा ही सनातन (शाश्वत) अंश है। प्रकृति में स्थित मन और पाँचों इंद्रियों को वह अपने साथ खींचता (धारण करता) है।
4. श्रीमद्भगवद्गीता - अध्याय 15, श्लोक 15
सर्वस्य चाहं हृदि सन्निविष्टो मत्तः स्मृतिर्ज्ञानमपोहनं च।
वेदैश्च सर्वैरहमेव वेद्यो वेदान्तकृद्वेदविदेव चाहम्॥
भावार्थ: मैं ही सभी प्राणियों के हृदय में स्थित हूँ। मुझ से ही स्मृति, ज्ञान और उनका अपोहन (भूलना/नष्ट होना) होता है। सभी वेदों द्वारा जानने योग्य, वेदांत का रचयिता और वेदों को जानने वाला भी मैं ही हूँ।
5. शांति पाठ (अंतिम श्लोक)
ॐ सर्वे भवन्तु सुखिनः। सर्वे सन्तु निरामयाः।
ॐ शान्तिः.. शान्तिः.. शान्तिः॥
भावार्थ: सभी लोग सुखी हों, सभी निरोगी (स्वस्थ) हों। चारों तरफ शांति ही शांति हो।
Title: Pitru Mukti Mahamantra: The path to the soul's peace of ancestors and happiness and prosperity at home
Description:
The ancient tradition of offering water, sesame seeds, and kusha grass for the soul's peace of our ancestors during Pitru Paksha or special occasions removes Pitru Dosha in our lives and helps us receive their blessings.
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1. Mangalacharan (Opening Verse)
ॐ देवताभ्यः पितृभ्यश्च महायोगिभ्य एव च।
नमः स्वाहायै स्वधायै नित्यमेव नमो नमः॥
ॐ पितृभ्यः शान्तिः। ॐ पितृभ्यः नमः।
Meaning: Salutations again and again to all the gods, great ancestors, and yogis. We bow daily to Goddess 'Svaha', who accepts oblations, and Goddess 'Svadha', who satisfies the ancestors. O Pitrugana (ancestors)! May you find peace, and our repeated salutations to you.
2. Srimad Bhagavad Gita - Chapter 7, Verse 19
बहूनां जन्मनामन्ते ज्ञानवान्मां प्रपद्यते।
वासुदेवः सर्वमिति स महात्मा सुदुर्लभः॥
Meaning: After many births, the wise person who possesses true knowledge surrenders unto Me, realizing that Vasudeva (Lord Krishna) is everything. Such a great soul is exceedingly rare.
3. Srimad Bhagavad Gita - Chapter 15, Verse 7
ममैवांशो जीवलोके जीवभूतः सनातनः।
मनःषष्ठानीन्द्रियाणि प्रकृतिस्थानि कर्षति॥
Meaning: The living entities in this conditioned world are My eternal fragmental parts. Due to conditioned life, they are struggling with the six senses, which include the mind, and are rooted in material nature.
4. Srimad Bhagavad Gita - Chapter 15, Verse 15
सर्वस्य चाहं हृदि सन्निविष्टो मत्तः स्मृतिर्ज्ञानमपोहनं च।
वेदैश्च सर्वैरहमेव वेद्यो वेदान्तकृद्वेदविदेव चाहम्॥
Meaning: I am seated in everyone's heart, and from Me come remembrance, knowledge, and forgetfulness. By all the Vedas, I am to be known. Indeed, I am the compiler of Vedanta, and I am the knower of the Vedas.
5. Shanti Path (Closing Verse)
ॐ सर्वे भवन्तु सुखिनः। सर्वे सन्तु निरामयाः।
ॐ शान्तिः.. शान्तिः.. शान्तिः॥
Meaning: May all be happy. May all be free from illness. May there be peace, peace, and absolute peace everywhere.