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बहुत देर से ज़िंदा हूँ | Bahut der se Zinda hu | Jaun Elia को एक संगीतमय ख़त | Original Ghazal

Game of Songs

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बहुत देर से ज़िंदा हूँ | Bahut der se Zinda hu | Jaun Elia को एक संगीतमय ख़त | Original Ghazal

286 просмотров · 2 нед. назад
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“बहुत देर से ज़िंदा हूँ” उस थकान की ग़ज़ल है जो शरीर में नहीं, अस्तित्व में उतरती है—जब इंसान सबके लिए उपस्थित रहता है, लेकिन धीरे-धीरे अपने ही जीवन से अनुपस्थित हो जाता है। बहुत देर से ज़िंदा हूँ— मगर जीता कहाँ हूँ मैं? सभी का हो के बैठा हूँ— मगर अपना कहाँ हूँ मैं? यह गीत उस व्यक्ति की आवाज़ है जिसने सबके हिस्से के दिए जलाए, मगर अपने कमरे में रौशनी रखना भूल गया। जो दुनिया की नज़रों में आबाद रहा, लेकिन अपने भीतर कभी घर नहीं बना पाया। यह रचना महान शायर जौन एलिया की बेचैन, अस्तित्ववादी और निर्मम आत्मप्रश्न करती काव्य-दृष्टि को हमारा संगीतमय प्रणाम है। यह जौन एलिया की किसी ग़ज़ल का रूपांतरण नहीं है। इसके शब्द और संगीत-परिकल्पना पूर्णतः मौलिक हैं—उनकी शायरी के प्रति प्रेम और सम्मान से जन्मी एक स्वतंत्र रचना। 🎵 Song: बहुत देर से ज़िंदा हूँ 📖 Series: जौन एलिया को एक संगीतमय ख़त ✍️ Original Lyrics & Concept: Rajesh Kuttan 🎬 Presented by: Game of Songs क्या कभी आपको भी लगा है कि जीवन चलता रहा, लेकिन आप कहीं पीछे छूट गए? अपने एहसास comments में साझा करें। #BahutDerSeZindaHoon #JaunEliaTribute #OriginalGhazal #HindiGhazal #UrduPoetry #GameOfSongs #Rajeshkuttan #ExistentialPoetry #HindiUrduPoetry