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01. लक्षण का स्वरूप | लक्षण - लक्षणाभास | बांसवाड़ा प्रवास | आ. बाल ब्रह्मचारी श्री सुमतप्रकाशजी

Baal Br. Pt. Sumat Prakash Ji

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01. लक्षण का स्वरूप | लक्षण - लक्षणाभास | बांसवाड़ा प्रवास | आ. बाल ब्रह्मचारी श्री सुमतप्रकाशजी

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रत्नत्रयमय जिनशासन ही, महावीर का शासन है। क्या चिंता अध्रुव की तुझको, ध्रुव तेरा सिंहासन है ।। टेक ।। द्रव्यदृष्टि से निज को देखे, स्वयं स्वयं में तृप्ति हो । भेद - विज्ञान सहज ही वर्ते, किंचित् नहीं आसक्ति हो ।। अद्भुत समता हो जीवन में, तत्त्वों का प्रतिभासन है ।। 1।। आर्विभूत सामान्य हुआ है, तिरोभूत हैं सर्व विशेष । सम्यक् हो परिणमन सहज ही, राग-द्वेष हुए निःशेष । । शासक कोई अन्य नहीं है, सहज रूप अनुशासन है ।। 2।। परम अहिंसा सहज प्रवर्ते, हिंसा का नहीं कोई काम । निवृत्तिमय परिणति शोभे, पर वृत्ति का नहीं कुछ नाम ।। अहो अलौकिक प्रभुता विलसे, हो विभाव का नाशन है ।। 3 ।। सम्यक् दर्शन मूल अहो, चारित्र वृक्ष पल्लवित हुआ । ज्ञान ज्ञान में भासे क्षण-क्षण, दशलक्षण से फलित हुआ ।। है निश्चिंत द्रौपदी सुखमय नहीं कोई दुःशासन है । 4।। सत्य अहिंसा प्राण हमारे, तत्त्वज्ञान का ध्रुव आधार । जिनभक्ति हो सदा हृदय में, मुक्तिमार्ग का हो विस्तार ।। सहज निशंक सहज निर्भय हैं, मिला हमें जिनशासन है ।। 5 ।। ध्रुव दृष्टि प्रगटी अंतर में, मोह महातम नाशा है। ज्ञेय मूढ़ता मिटी सहज ही, ज्ञायक ही प्रतिभासा है ।। भक्ति भाव से होय वंदना, व्यक्त नमोऽस्तु शासन है ।। 6।। सपने में भी नहिं विराधना, और मलिनता हो पावे । घोर परीषह उपसर्गों में, चित्त नहीं चिगने पावे ।। सावधान होवें अपने में, अप्रमत्त यह शासन है ।। 7।। इष्ट-अनिष्ट न कुछ भी भासे, किंचित् नहीं विषमता हो । ज्ञायक में संतुष्टि होवे, ज्ञेयों में नहीं ममता हो ।। ज्ञानमयी वैराग्यमयी, आनंदमयी ये शासन है ।। 8 ।। रचयिता : आ. बाल ब्रह्मचारी श्री रवीन्द्रजी ‘आत्मन्’ Source: सहज पाठ संग्रह (page 79) #brravindraji #brsumatprakashji #pravachan