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श्री ईशोपनिषद अध्ययन - मंत्र 5(1) | दिवस 9

“Cheto Darpan Marjanam – 🙏@SNGM Banglore

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श्री ईशोपनिषद अध्ययन - मंत्र 5(1) | दिवस 9

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“Cheto Darpan Marjanam – 🙏@SNGM Banglore
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🌸 श्री ईशोपनिषद अध्ययन - मंत्र 5 (Divas 9,) 🌸 हरे कृष्ण 🙏 --- मंत्र 5 तदेजति तन्नैजति तद्दूरे तद्वन्तिके। तदन्तरस्य सर्वस्य तदु सर्वस्यास्य बाह्यतः॥ अनुवाद: परमेश्वर चलते हैं और नहीं भी चलते, वे बहुत दूर हैं लेकिन अत्यंत निकट भी हैं। वह सबके भीतर हैं, फिर भी वह सबके बाहर भी हैं। --- *तात्पर्य के मुख्य बिंदु - *1. भगवान के दिव्य गुणों का वर्णन भगवान सर्वव्यापी हैं, साकार रूप और निराकार रूप दोनों हैं। क्योंकि हम भगवान को आँखों से नहीं देख सकते, इसका अर्थ यह नहीं कि भगवान निराकार हैं। यह मंत्र खंडन करता है कि भगवान बहुत दूर हैं, लेकिन अति निकट भी हैं। 2. भगवान का धाम भगवान का धाम भौतिक आकाश से परे है। अपनी सीमित इंद्रियों द्वारा हम उन्हें नहीं देख सकते। अगर हम साकार हैं, तो अवश्य हमें बनाने वाले निराकार तो नहीं हो सकते। जब हम भौतिक आकाश को भी अपनी सीमित इंद्रियों द्वारा नहीं समझ सकते, तो भगवान का आध्यात्मिक धाम तो बहुत दूर की बात है। 3. भगवान की अर्चा-विग्रह के रूप में कृपा फिर भी भगवान हमारे समक्ष आते हैं, तो हम अनदेखी करते हैं। श्रीमद् भगवद् गीता (9.11) में इसकी भर्त्सना भगवान द्वारा की गई है। पूर्ण अचिन्त्य शक्तियों के कारण भगवान किसी भी माध्यम से हमारी सेवा स्वीकार कर सकते हैं। अपनी इच्छा अनुसार रूपांतरित कर सकते हैं। उदाहरण: भगवान अर्चा-विग्रह में मिट्टी, पत्थर या लकड़ी के बने विग्रह के रूप में प्रकट हो सकते हैं, क्योंकि भगवान सर्व-शक्तिमान हैं। वह अपनी इच्छा अनुसार कहीं भी, किसी भी रूप में प्रकट हो सकते हैं। जैसा कि हम अपनी अपूर्ण इंद्रियों से भगवान को नहीं देख सकते, फिर भी भक्त उन्हें भौतिक दृष्टि से देखना चाहता है, तो भक्त के अनुग्रह पर भगवान तथाकथित भौतिक रूप में प्रकट होकर भी भक्तों की सेवा लेते हैं, क्योंकि वह परम पुरुषोत्तम भगवान हैं, परिपूर्ण हैं। ऐसे भक्त जो भक्ति की निम्नतम अवस्था में हैं, वह किसी मूर्ति की पूजा नहीं करते, वास्तव में भगवान की पूजा करते हैं। भगवान की इच्छा अनुसार ही हम उनके अर्चा-विग्रह के स्वरूप को देख सकते हैं। निष्ठावान भक्त के द्वारा अनुभूति होती है, नास्तिक के द्वारा नहीं। 4. भगवद् गीता के प्रमाण *गीता 4.11 में भगवान कहते हैं -* भक्त की शरणागति की मात्रा के अनुसार भगवान समक्ष प्रकट होते हैं। वह शरणागत के लिए हमेशा सुलभ हैं, पर जो शरणागत नहीं हैं, उनके लिए अति दूर तथा अगम्य हैं। 5. सगुण तथा निर्गुण भगवान सगुण तथा निर्गुण किसी भी रूप में हो सकते हैं। उनके लिए भौतिक तथा आध्यात्मिक शक्तियों में अंतर नहीं होता, क्योंकि वह समस्त शक्तियों के स्रोत हैं, नियंता हैं। वह किसी भी शक्ति को, गुण को अपने निर्देशानुसार नियंत्रित कर सकते हैं। 6. भक्त प्रह्लाद की कथा बालक संत प्रह्लाद महाराज अपने नास्तिक पिता के पूछने पर कि ईश्वर कहाँ है, तो उन्होंने कहा कि वह सर्वत्र है। तो उसने कहा कि खंभे में भी है? बालक ने कहा हाँ। नास्तिक राजा ने खंभे को खंड-खंड कर दिया और भगवान नृसिंह रूप में प्रकट हो गए और उसका संहार किया। भगवान सर्वत्र हैं और वह अपने निष्ठावान भक्त को कृपा दिखाने के लिए कहीं भी प्रकट हो सकते हैं। वह नास्तिक राजा के आदेश से नहीं प्रकट हुए, बल्कि अपने शुद्ध भक्त की इच्छा से प्रकट हुए। 7. ब्रह्म संहिता का प्रमाण (5.37) आदि भगवान गोविंद द्वारा प्रत्येक वस्तु में प्रवेश करते हैं। ब्रह्मांड के सारे परमाणुओं में हैं, विराट रूप में प्रत्येक वस्तु के बाहर हैं, अंतर्यामी रूप में प्रत्येक वस्तु के अंदर हैं। अंतर्यामी रूप में वे हर घटना के साक्षी हैं और हमें कर्मों का फल देते हैं। हम भले ही पूर्व जन्म की बात भूल जाएं, पर भगवान तो साक्षी हैं और हमें अपने कर्मों का फल तो भोगना ही पड़ता है। 8. अंतिम सार तथ्य है - भीतर तथा बाहर ईश्वर के अतिरिक्त कुछ नहीं है। जिस तरह अग्नि से ताप और प्रकाश प्रकट होते हैं, उसी तरह भगवान सभी शक्तियों में एकरूपता है और इस एकरूप होने पर भगवान सभी वस्तुओं को पूर्ण रूप से भोगते हैं, अंश रूप जीव तो सूक्ष्म मात्रा में भोक्ता है। हरे कृष्ण 🙏