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क्या जाति का खात्मा नामुमकिन है? I #kadwicoffee

Kadwi Coffee I कड़वी कॉफी

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क्या जाति का खात्मा नामुमकिन है? I #kadwicoffee

6 944 просмотра · 10 месяцев назад
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क्या जाति अंतिम सत्य है? भारतीय समाज में जाति की जड़ें कितनी गहरी हैं? और क्या आधुनिक लोकतंत्र में जाति की प्रासंगिकता बदल रही है? इन्हीं सवालों पर एक महत्वपूर्ण, गहन और तथ्यपूर्ण बातचीत लेकर आए हैं प्रख्यात समाजशास्त्री प्रो. सतीश देशपांडे, बातचीत में शामिल हैं अपूर्वानंद। इस संवाद में चर्चा के मुख्य बिंदु: जाति: सामाजिक व्यवस्था या सत्ता संरचना? आज के भारत में जाति की नई आकृतियाँ शिक्षा, नौकरी और राजनीति में जाति की भूमिका जाति पहचान और आधुनिकता का संघर्ष क्या जाति सचमुच ‘अंतिम सत्य’ है? यह चर्चा भारतीय समाज को समझने के लिए अत्यंत उपयोगी है—छात्रों, शोधकर्ताओं, पत्रकारों, नीति-निर्माताओं और आम दर्शकों सभी के लिए। 👉 वीडियो देखें, अपने विचार साझा करें, और बातचीत को आगे बढ़ने दें। #castedebate #satishdeshpande #apoorvanand #castesystem #indiansociety #socialjustice #casteinindia #sociology #equalitynow #bahujanissues #indiandemocracy #socialchange #academicdiscussion ============================================================== A Hindi blog of long-form discussions on contemporary cultural and socio-political questions faced by the Indian society. कड़वी कॉफी लम्बी बातचीतों के अलग- अलग सिलसिले हैं. हमारे जिंदगी, दुनिया, देश से जुड़े मसलों को समझने, उनकी बारीकियों और गहराइयों तक जाने की एक कोशिश. हिंदी में क्योंकि वहां शोर और सनसनी से बाहर तसल्ली और धीरज से विचार, विमर्श की जरूरत ज्यादा है. लोकतंत्र, समाज, नागरिकता, शिक्षा, न्याय, राज्य, मीडिया, जेंडर, संस्कृति, बाज़ार जैसे व्यापक संकायों के वे सिरे जो हम सबको प्रभावित कर रहे हैं. कोशिश रहेगी तथ्य, तर्क और मनुष्यता की रौशनी में बातों को देखना और उस रौशनी को आगे बढ़ाना. यह एक खुला मंच है जो हिंदी के प्रोफेसर अपूर्वानंद, सामाजिक कार्यकर्ता पंकज, पत्रकार एन.आर. मोहंती और निधीश त्यागी की पहल से शुरू हुआ है. इसमें संपादकीय सहयोग पत्रकार अजय शर्मा और तकनीकी सहयोग के मनीष सिंह का है. बिना किसी मुनाफे की मंशा या मकसद के. आपका स्वागत है. और हमें उम्मीद है कि आपके जरिये ये विमर्श थोड़ा और सार्थक और समृद्ध होगा.