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बुरा जो देखन मैं चला, बुरा न मिलिया कोय | अपना दोष भी देख रे मनवा | कबीर के दोहे | Kabir Folk Song

Divine Bhakti Vibes

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बुरा जो देखन मैं चला, बुरा न मिलिया कोय | अपना दोष भी देख रे मनवा | कबीर के दोहे | Kabir Folk Song

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“बुरा जो देखन मैं चला, बुरा न मिलिया कोय…” कबीर साहब का यह अमर दोहा हमें एक बहुत गहरी बात समझाता है—दूसरों में दोष ढूँढना आसान है, लेकिन अपने मन और अपने दोषों को देखना ही असली आत्म-मंथन है। “अपना दोष भी देख रे मनवा” एक सरल, मिट्टी से जुड़ा कबीराना लोकगीत है, जो हमें क्रोध, लोभ, अहंकार, शिकायत और दूसरों को दोष देने से पहले खुद से एक सवाल पूछने की याद दिलाता है— “मैं कैसा हूँ?” एकतारा, डफली, खड़ताल और देसी लोकधुन की सहजता के साथ प्रस्तुत यह Kabir Folk Song • Lyrical Video आत्मचिंतन और आत्म-पहचान की एक छोटी-सी यात्रा है। अगर गीत की कोई पंक्ति आपके मन को छू जाए, तो कमेंट में लिखिए — “मैं कैसा हूँ?” 🙏 ⸻ 🪕 कबीर का दोहा बुरा जो देखन मैं चला, बुरा न मिलिया कोय। जो दिल खोजा आपना, मुझसे बुरा न कोय॥ — कबीर दास ⸻ 🎶 Lyrics | गीत के बोल जग को दोषी कहता फिरता, अपना दोष भी देख रे मनवा। दूजे की मैल निहारत बैठा, अपनी मैल भी देख रे मनवा। अपना दोष भी देख रे मनवा… अपना दोष भी देख… अंतरा 1 दूजे की बात तौले दिन-रैन, अपनी बात न तौल। दूजे की गाँठ गिनता बैठा, अपनी गाँठ न खोल। किसने क्या कहा रे मनवा, किसने क्या दुख दिया। अपनी बोई राह के काँटे, दूजे के सिर धर दिया। मुखड़ा अपना दोष भी देख रे मनवा, अपना दोष भी देख। दूजे की मैल निहारत बैठा, अपनी मैल भी देख। अंतरा 2 क्रोध उठे तो जग जलता रे, लोभ उठे तो मन। मान मिला तो फूल गया तू, भूल गया अपना मन। दूजे को छोटा कहता फिरता, अपना आपा बड़ा। मन की चाल न देखी तूने, जग को दोष धरा। अबकी बार न शिकवा करना, न कोई इल्ज़ाम धर। जो जैसा है, वैसा देख ले, पहले अपना मन पढ़। मुखड़ा अपना दोष भी देख रे मनवा, अपना दोष भी देख। दूजे का लेखा छोड़ रे मनवा, अपना लेखा देख। अंतरा 3 जो चुभता है दूजे में रे, अपने भीतर देख। जिस बात पे मन रूठे तेरा, उसकी गाँठ भी देख। हर बात पे तू सही बने रे, कहाँ गया वो मान? अपने मन की हार को माने, तभी खुले पहचान। जग को दोषी कहता फिरता, अपना ही मन दोषी निकला। दूजे में जो काँटा देखा, अपने मन में चुभता निकला। सेतु ठहर रे मनवा… थोड़ा ठहर… काहे भागे? काहे डरे? दूजे से क्या लड़ता रे, पहले खुद से नज़र करे। न कोई सफ़ाई… न कोई बहाना… आज बस इतना पूछ— “मैं कैसा हूँ?” अंतरा 4 ना खुद को साधु मान रे मनवा, ना खुद को पापी जान। जितना सच है, उतना देख ले, यही बड़ी पहचान। गिरा है तो गिरना देख ले, उठा तो मत इतराय। अपने मन की चाल समझ ले, फिर जग क्या भरमाय? अपना दोष भी देख रे मनवा, अपना दोष भी देख। दूजे का लेखा छोड़ रे मनवा, अपना लेखा देख। अंतिम मुखड़ा बुरा जो देखन मैं चला, बुरा न मिलिया कोय। जो दिल खोजा आपना, मुझसे बुरा न कोय। जग को दोषी कहता फिरता, अपना दोष भी देख रे मनवा। दूजे में दोष न खोज रे मनवा, पहले अपना मन देख। अपना दोष भी देख रे मनवा… अपना दोष भी देख… समापन ना जग जीता, ना जग हारा… अपना भेद खुला। दूजे को दोष देते-देते, अपना चेहरा मिला। अपना दोष भी देख रे मनवा… अपना दोष भी देख… ⸻ 🙏 अगर आपको कबीर की सरल और सच्ची वाणी पसंद है, तो वीडियो को Like करें, Share करें और ऐसे ही कबीराना गीतों के लिए Channel को Subscribe करें। #Kabir #KabirKeDohe #KabirVani #Kabiraana #KabirFolkSong #BuraJoDekhanMainChala #ApnaDoshBhiDekh #KabirSong #HindiFolk #SantVani #LyricalVideo #KabirDas #कबीर #कबीरकेदोहे #कबीरवाणी #अपनादोषभीदेख #बुराजोदेखनमैंचला