तुम्हारे अंदर ही परमेश्वर है? | अष्टावक्र गीता 1.19 | @MokshaMarg-18
Moksha Marg 18
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तुम्हारे अंदर ही परमेश्वर है? | अष्टावक्र गीता 1.19 | @MokshaMarg-18
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क्या परमेश्वर केवल मंदिर, मूर्ति या किसी दूर स्थान में है?
या फिर वही परम सत्य तुम्हारे भीतर और तुम्हारे बाहर भी व्याप्त है?
अष्टावक्र गीता अध्याय 1, श्लोक 19 में महर्षि अष्टावक्र एक अत्यंत गहरी उपमा देते हैं। जैसे आईने में किसी व्यक्ति का प्रतिबिंब दिखाई देता है, लेकिन व्यक्ति केवल आईने तक सीमित नहीं होता, वैसे ही इस शरीर के भीतर और बाहर परमेश्वर की उपस्थिति को समझने की दिशा यहाँ दिखाई जाती है।
इस वीडियो में हम समझेंगे:
• आईने और प्रतिबिंब का उदाहरण क्या बताता है?
• शरीर और चेतना में क्या अंतर है?
• "अंदर" और "बाहर" का अनुभव कहाँ प्रकट होता है?
• अद्वैत वेदांत में परमेश्वर को कैसे समझा जाता है?
• क्या मैं और दूसरा वास्तव में इतने अलग हैं?
• "मैं हूँ" की भावना को आत्मचिंतन में कैसे देखा जाए?
• साक्षी चेतना की ओर ध्यान कैसे मोड़ा जाए?
• इस श्लोक को रोज़मर्रा के जीवन में कैसे लागू करें?
यह वीडियो अष्टावक्र गीता, अद्वैत वेदांत, आत्मज्ञान, आत्म-विचार, साक्षी भाव, चेतना, परमेश्वर, आत्मा, अद्वैत और Self Inquiry को समझने वाले दर्शकों के लिए है।
यहाँ उद्देश्य केवल श्लोक का अर्थ सुनना नहीं है, बल्कि उस प्रश्न को अपने भीतर देखना है:
"जिसके कारण यह पूरा अनुभव मुझे दिखाई दे रहा है, वह क्या है?"
अगर आप अष्टावक्र गीता को क्रम से समझना चाहते हैं, तो Moksha Marg की अष्टावक्र गीता Series को पूरा देखें और अगले श्लोक से जुड़े प्रश्न तक जाएँ।
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Moksha Marg पर हम आत्मज्ञान, अद्वैत वेदांत, भगवद्गीता, उपनिषद, अष्टावक्र गीता और Self Inquiry को सरल हिंदी में समझने का प्रयास करते हैं।
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