श्रीमद्भगवद्गीता : अध्याय 3 : श्लोक 25–29 | ज्ञानी और अज्ञानी में क्या अंतर है? | Bhagavad Gita
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श्रीमद्भगवद्गीता : अध्याय 3 : श्लोक 25–29 | ज्ञानी और अज्ञानी में क्या अंतर है? | Bhagavad Gita
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॥ ॐ श्रीकृष्णाय नमः ॥
ज्ञानी और अज्ञानी दोनों कर्म करते हैं, लेकिन उनके कर्म करने की भावना में क्या अंतर है?
भगवान श्रीकृष्ण अध्याय 3 के श्लोक 25–29 में बताते हैं कि ज्ञानी व्यक्ति बिना आसक्ति के कर्म करता है, जबकि अज्ञानी व्यक्ति कर्मफल और कर्तापन के अहंकार से बंधा रहता है।
इस वीडियो में जानेंगे—
🔹 ज्ञानी व्यक्ति कर्म क्यों करता है?
🔹 "मैं ही कर्ता हूँ" का अहंकार क्या है?
🔹 प्रकृति के गुण कर्म कैसे करवाते हैं?
🔹 ज्ञानी व्यक्ति को दूसरों को भ्रमित क्यों नहीं करना चाहिए?
🕉️ मुख्य संदेश: कर्म छोड़ना समाधान नहीं है। कर्म करते हुए आसक्ति और कर्तापन के अहंकार से ऊपर उठना ही कर्मयोग की दिशा है।
अगले वीडियो में श्लोक 30–35 में जानेंगे कि कर्मों को भगवान को समर्पित करके कैसे किया जाए और स्वधर्म का महत्व क्या है।
🙏 राधे राधे।
ॐ तत्सत्।
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