झूलत दोऊ नवल किशोर | श्री हित चतुरासी पद 35 | राधा-कृष्ण झूला लीला | Geetaji
GitaJi
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झूलत दोऊ नवल किशोर | श्री हित चतुरासी पद 35 | राधा-कृष्ण झूला लीला | Geetaji
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राधे राधे 🙏🏻🌸
श्री हित चतुरासी जी की 84 पदों की भाव-यात्रा में आज प्रस्तुत है—पद 35: “झूलत दोऊ नवल किशोर”, जिसकी रचना श्री हित हरिवंश महाप्रभु जी ने की है।
भोर के सुंदर समय में श्रीराधा और श्रीकृष्ण फूलों से सजे हिंडोले पर विराजमान हैं। झूले का झोंका तेज होता है तो सुकुमारी राधारानी अपने प्रीतम के हृदय का आश्रय लेती हैं। उनके नयन, मधुर गायन और प्रेम को देखकर ललिता आदि सखियाँ आनंद से खिल उठती हैं।
इस पद का सुंदर भाव है—
जीवन का झूला जब तेज हो जाए, तब डरने के बजाय अपने आराध्य का आश्रय लीजिए। प्रेम की बाँहों में भय भी निकटता बन जाता है।
🌸 मूल पद 🌸
झूलत दोऊ नवल किशोर।
रजनी-जनित रंग सुख सूचत, अंग-अंग उठि भोर॥
अति अनुराग भरे मिलि गावत, सुर मंदर कल घोर।
बीच-बीच प्रीतम चित चोरत, प्रिया नैंन की कोर॥
अबला अति सुकुमार डरत मन, वर हिंडोर झकोर।
पुलकि-पुलकि प्रीतम उर लागत, दै नव उरज अँकोर॥
अरुझी विमल माल कंकन सौं, कुंडल सौं कच डोर।
वेपथ जुत क्यौं बनैं विवेचित, आनँद बढ्यौ न थोर॥
निरखि-निरखि फूलत ललितादिक, विवि मुख चन्द्र चकोर।
दै असीस हरिवंश प्रसंसत, करि अंचल की छोर॥
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