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विवाह गीत - अमवा के बाग बाबा | राम नारायण तिवारी 'भदवरिया' | दुर्गेश उपाध्याय | गुरु दयाल

भोजपुरी के साधक - Durgesh Upadhyay

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विवाह गीत - अमवा के बाग बाबा | राम नारायण तिवारी 'भदवरिया' | दुर्गेश उपाध्याय | गुरु दयाल

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डॉ. राम नारायण तिवारी 'भदवरिया' जी (©®) भोजपुरी लोकसाहित्य के उन प्रतिष्ठित रचनाकारों में हैं जिन्होंने लोकगीतों को केवल मनोरंजन का माध्यम नहीं माना, बल्कि उन्हें भारतीय पारिवारिक जीवन, लोक-मनोविज्ञान और सांस्कृतिक मूल्यों का जीवंत दस्तावेज़ बनाया। उनके गीतों में लोकभाषा की सहजता, भावों की प्रामाणिकता और मानवीय संबंधों की गहन संवेदना अद्वितीय रूप से दिखाई देती है। प्रस्तुत विवाह-गीत इसका उत्कृष्ट उदाहरण है, जिसमें बेटी और पिता के बीच का संवाद केवल शब्दों का आदान-प्रदान नहीं, बल्कि भारतीय परिवार की आत्मा का सजीव चित्रण है। गीत की पहली पंक्ति में बेटी कहती है— "अमवा के बाग बाबा लावेल महुआ, पीपरा पोखरवा अरार, दुअरा पो लावऽ बाबा निमिया के गछिया, नाही कहीं लावऽ बांसवारि।" यहाँ बेटी अपने पिता से प्रतीकात्मक आग्रह करती है। वह चाहती है कि घर के चारों ओर ऐसे वृक्ष हों जो जीवन दें, छाया दें, सुख दें और कुल की प्रतिष्ठा बढ़ाएँ। आम का बाग समृद्धि और प्रेम का, महुआ जीविका और मधुरता का, पीपल कुल-परंपरा और आध्यात्मिक संरक्षण का तथा नीम स्वास्थ्य और शीतलता का प्रतीक है। किन्तु वह विशेष आग्रह करती है कि "बाँस की बसवारी मत लगाइए।" पहली दृष्टि में यह आग्रह विचित्र लगता है, क्योंकि ग्रामीण जीवन में बाँस अत्यंत उपयोगी माना जाता है। यहीं से गीत का मनोवैज्ञानिक आयाम प्रारंभ होता है। पिता उत्तर देते हैं— "बगिया के बियरन लवनी महुआ... निमइया के गछिआ दी जूड़ सीत छांहिया, दुख अति देला बसवारी।" पिता को आश्चर्य होता है कि जो बाँस पूरे जीवन का सहारा है, वही बेटी के लिए दुख का कारण कैसे हो सकता है। तब बेटी कहती है— "कवन दुख देला बाबा बाँस बसवरिआ, बाँस हँ जिनिगिया अधार, जनम से मरनी में बंसवे के जोहवत..." यहीं गीत अपने चरम पर पहुँचता है। बेटी स्वयं स्वीकार करती है कि बाँस जन्म से मृत्यु तक हर संस्कार में आवश्यक है। झूला, पालना, घर, खेती के उपकरण, विवाह का मंडप और अंततः अर्थी—सबमें बाँस का उपयोग होता है। अर्थात बाँस वास्तव में जीवन का आधार है। फिर भी वही बाँस उसे सबसे अधिक पीड़ा देता है। क्यों? क्योंकि उसी बाँस से मड़वा (विवाह-मंडप) बनता है। वह मंडप, जहाँ बेटी अपने पिता के आँगन से सदा के लिए विदा होकर किसी दूसरे घर की हो जाती है। अर्थात बेटी बाँस से नहीं, बल्कि उस बिछोह से दुखी है जिसका माध्यम बाँस बनता है। गीत की अंतिम पंक्तियाँ भारतीय लोकसाहित्य की सबसे मार्मिक पंक्तियों में गिनी जा सकती हैं— "मड़वा सबद जनी कह मोरी बेटी, मड़वा के दुख न कहाय, मड़वा के दुख खाली बेटी बाप जानेला, रोवत खोजे माड़ो में बिहान।" यहाँ पिता का उत्तर किसी तर्क का उत्तर नहीं, बल्कि हृदय की टूटन का स्वीकार है। विवाह के अगले दिन जब बेटी विदा हो जाती है, तब वही मंडप सूना रह जाता है। रातभर जहाँ मंगलगीत गूँजते थे, वहाँ सुबह केवल सन्नाटा होता है। पिता अनायास उसी खाली मड़वे के पास चले आते हैं। उन्हें लगता है कि शायद उनकी बेटी अभी भी वहीं होगी। वे उसे खोजते हैं, जबकि वे जानते हैं कि वह जा चुकी है। "रोवत खोजे माड़ो में बिहान"—यह पंक्ति केवल दृश्य नहीं, बल्कि भारतीय पिता के मन की सबसे बड़ी सच्चाई है। भारतीय विवाह परंपरा में मड़वा केवल बाँस का ढाँचा नहीं होता। वह वह स्थान है जहाँ एक पिता अपनी बेटी का कन्यादान करता है। इसलिए लोकमानस में मड़वा आनंद और करुणा—दोनों का संगम है। डॉ. राम नारायण तिवारी 'भदवरिया' ने इस गीत में किसी कृत्रिम भावुकता का सहारा नहीं लिया। उन्होंने लोकजीवन की सहज भाषा में वह सत्य कह दिया है जिसे बड़े-बड़े साहित्यकार भी अनेक पृष्ठों में नहीं कह पाते। बेटी के लिए बाँस बसवारी केवल पेड़ों का समूह नहीं, बल्कि अपने मायके से बिछड़ने का प्रतीक है; और पिता के लिए मड़वा केवल विवाह का मंडप नहीं, बल्कि उस क्षण का स्मारक है जहाँ उसकी बेटी उसके आँगन से जीवन की नई यात्रा पर निकल जाती है। इसी कारण यह गीत भोजपुरी विवाह-संस्कारों का केवल एक लोकगीत नहीं, बल्कि भारतीय पिता-पुत्री संबंध का कालजयी मनोवैज्ञानिक और सांस्कृतिक दस्तावेज़ बन जाता है। इसमें लोकजीवन की सरल भाषा के भीतर छिपी करुणा, संवेदना और जीवन-दर्शन अपनी सबसे स्वाभाविक और सबसे प्रभावशाली अभिव्यक्ति प्राप्त करते हैं। #लोकधुनोंकीसाधना #डॉदुर्गेशकुमारउपाध्याय #drdurgeshupadhyay #भोजपुरीलोकसंगीत #लोकरस #भोजपुरीसंस्कृति #लोकसंसार #emotions #music @topfans Ram Narayan Tiwari Guru Dayal Music of Durgesh Durgesh K. Upadhyay Music Therapy in India