*मनमोहन भेष पलटि चलैं साँवरी सहेली*🪷 14 August 2026 #premsaheli #vlog #vrindavan
Prem Saheli
0:00 / 0:00
*मनमोहन भेष पलटि चलैं साँवरी सहेली*🪷 14 August 2026 #premsaheli #vlog #vrindavan
2 404 просмотра · 1 месяц назад
Prem Saheli
8,94 тыс. подписчиков
2 404 просмотра · 1 месяц назад
श्रीगुरु मंगल गाय मना ।
श्रीहरिदास चरन बंदन करि बिपुल बिनोद बढ़ाय घना ।। श्रीबिहारीविहारिनिदास परम रुचि सरस मनोरथ पाय घना। श्रीनरहरि रसिक सिरोमनि मूरति पीतांबर बलि जाय जना ।। ३ ।।
आजु महा मंगल भयौ माई।
भई प्रसन्न सिरोमनि राधे यह सुख कह्यौ न जाई ।।
परम प्रीति सौं बिलसत दोऊ प्रेम बढ्यौ अधिकाई।
श्रीहरिदासीजू रसिक सिरोमनि उमँगि उमँगि आनन्द झरि लाई ।
आजु समाज सहज मन भायौ।
कुँवरि किसोरी गोरी भोरी निरखि हरषि हँसि कंठ लगायौ ।।
अपने अपने मेल मिलीं सब तान तरंगनि रंग बढ़ायौ।
श्रीहरिदासीजू रसिक सिरोमनि तन मन बचननि हियौ सिरायौ ।। २ ।।
सौंधे न्हाइ बैठी पहिरि पट सुंदरि जहाँ फुलवारी तहाँ सुखवति अलकें।
कर नख सोभा कल केस सँवारति मानौं नव घन में उडगन झलकें ।।
विविध सिंगार लियें आगें ठाढी प्रिय सखी भयौ भरु आनि रतिपति दल दलकैं।
श्रीहरिदास के स्वामी स्यामा कुंजबिहारी की छवि निरखत लागत नहिं पलकें ।।
मनमोहन भेष पलटि चले साँवरी सहेली अपनौं नाँउ बनाइ ।
प्रेमसहेली सौं मिली श्री स्याँमाँ जू मोहिं मिलाइ ।।१।।
प्रेमसहेली यौं कह्यौ तू मेरौ सौ सीख सुभाव।
बौं मिलिये यौं बोलिये ज्यौं उपजै चित चाव ।।२।।
ते कह्यौ भलौ मन भाँवतौ अब बन्यौ (है) दाव उपाव।
हौं दैहुँ कहा सुख तेरौई सखि तोमें सबहि समाव ।।३।।
जो तू कहिहै सोई करिहों सखि तेरे पाँयनि पाँइ।
बातनि हिलि मिलि रंग रह्यौ फूली अंग न माइ ।।४।।
प्रेम सहेली कुंज में साजैं सकल सिंगार।
केस कुसुम बैंनी गुही सौंधे सरस सुढार ।।५।।
जूरौ चंपौ जगमगै मधि मुक्तामनि लाल ।
बिच बिच मल्ली मौलसिरी झब्बा सुरंग गुलाल ।।६।।
पटियनि प्रेम बनाइ लिख्यौ अरुन सरस सीमन्त ।
भ्रम तम स्रम सब दूरि होत सीसफूल हुलसंत ।।७।।
सेंदुर कौ तिरछौ तिलक बिच मृगमद बिंदुली बनाइ।
तन मन निरखि हरषि भयौ रीझि प्रियाजू की पाइ ।।८।।
अति बाँकी भौहें सोहैं अंजन नैन बिसाल ।
चितवत चितहिं चुरावहिं जुवति वृन्द नव बाल ।।९।।
बुटिला खुभी जराव के अवतंसनि मनि लाल ।
बेसरि मुक्ता झलमलै अधर मधुर सु रसाल ।।१०।
दसनावलि कल कुंद लौं मुख हँसत लसत बहु भाँति ।
रवि ससि कोटिक दामिनी सकुचि दुरति लजि जाति ।।११।।
रसनावलि गुन गन गर्ने जाँचति रति सुख सार।
चन्दन बन्दन कौ झलक चिबुक चखौंडा चार ।।१२।।
कंठपदिक छूटी लरें उज्ज्वल जलज सुदेस ।
राते डोरा दुरंग भये पहिरैं प्रेम अवेस । ॥१३॥
अतलस की अँगिया लसत अति आनन्द उदित उरोज ।
हँसति दुरति अंचल मुख दै तन घन मुदित मनोज ।।१४।।
विविध बरन बहु भाँति जाति सारी सुमन सुबास ।
लहँगा महँगा मोल नहीं कोमल विमल विलास ।।१५।।
कर पहुँची चारि चारि चूरी कंकन बलय बाजूबंद ।
अँगुरिन मुंदरी सुन्दरी नखनि लसत सत इंदु ।। १६ ।।
अर्धचन्द बाँकी चौकी उपमा दैहुँ सु काहि ।
झाबनि पर फौंदा फबै मानौं उपजे हैं मदन उमाँहि ।।१७।।
त्रिवली उदर सुहावनी मधि मोहन नाभि गंभीर ।
छीन मध्य कटि किंकिनी मुखरित मुदित अधीर ।।१८।।
सुन्दर सुभर नितम्बिनी जंघनि मनि मौज बिलोल ।
सरस स्निग्ध सुवन बनी गुल्फ पिंडुरिया गोल ।।१९।।
पगनि घूँघरा बाजने एड़ी अँगुरी लाल ।
लटकि चलति गज गति लजति सीखत सुगति माल ।। २० ।।
चूरा चौका चाँदिनी पग नखनि दसहुँ दिसि जोति।
जित ढरि चरन सुधरनि धरति तित प्रीति प्रगट ही होति ।। २१ ।।
अंग अंग निहारति मन हरति आरति तन मन काम।
प्रेम सहेली लै चलीं नवल कमल कुंज धाम ।।२२।।
मेघ महल परदा फुही बहु बादर बिमल वितान ।
अद्भुत वन आनंदमई तहाँ राजैं स्याँमाँ रसिक निधान ।।२३।।
रतन खचित सारौट पर बैठी बनि विस्तार।
प्यारी प्रीतम कौ हित चित धरै हुलसति हँसति उदार ।।२४।।
सोहत सखी समूह में जीति मदन भई भूप।
पचरंग छत्र चॅवर दुरै मन मोह्यौ स्यामा रूप अनूप ।।२५।।
प्रेमसहेली फिर चितयौ कछुक सिखै लई लाज।
चली चली जब निकट आई चंचल सहज विराज ।।२६।।
चौंकि परी चितयौ सबनि यह को आई आन ।
चौंकि परी चितयौ सबनि यह को आई आन।
प्रेमसहेली यौं कह्यौ यह सरस निपुन गुन गान ।।२७।।
एक प्रेम सबहिन भयौ लै आई बर बाम ।
प्रेमसहेली आगें है बोल लई निज नाम ।। २८ ।।
प्रेमसहेली यौं कह्यौ यह मेरे कुल सील समान ।
सरवस प्रेम हियौ सच्यौ लै मिली अप वपु प्रान।।२९।।
देखत मन औरै भयौ आदर कियौ है सराहि।
नवल किसोरी यौं कह्यौ तू मो ढिंग तें जिनि जाहि ।।३०।।
नख सिख सुन्दर मोहिनी श्री स्यामाजू के प्रान।
अंग अंग रस बरसहीं नागरि सुघर सुजान ।॥३१॥
नवलकिसोरी यौं कह्यौ मोहिं अपनों सो सिंगार सिखाय।
सुनत स्रवन मन मोद भयौ सीखौ बलि कह्यौ है लड़ाय ।।३२।।
पानि परसि हँसि लै चली नव केसर की कुंज ।
अरुन स्याम सित पीत मधुप गावत रस जस पुंज ।।३३।।
प्रेमसहेली पहिले ही रचि सचि सीतल सेज।
सकल सौंज उपयोग भोग प्रानप्रियाजू के हेज ।।३४।।
तन रोम हरषि पुलकावली कीनों है कुंज प्रवेस ।
काम कुंज अभिरामहीं बहु भाँतिन बढ्यौ (है) अवेस ।।३५।।
मूलताल-
अब कछु राग सुनाइ सखी रही रुख लियें मुख चाहि।
प्रगट प्रेम न जनावहीं (और) गावत उमहि उमाहि।। ३६ ।।
जाके गावत तान तरंग अनंग नचै (और) लीनी कंठ लगाइ।
भेंटत भुजनि भरम गयौ (और) मिलि अंग अंग समाइ ।।३७।।
मधुर प्रेम रस सिन्धु बढ्यौ (और) गई निसि नसि भयौ भोर।
बिलसत हँसत न जानहीं (और) भोरहु जुगलकिसोर ।।३८ ।।
प्रेमसहेली के प्रेम कौं (और) गावत ललना लाल ।
छिन छिन प्रति रति विस्तरत (और) करत प्रान प्रतिपाल ।। ३९ ।।
जो तुम मेरे प्रानपियारे रंगभरे उमँगि ढरे रसरासि ।
तौ हौं तुम्हरौ जस गाऊँ दिन दुलराऊँ तू तौ मेरी जीवनि बिहारिनिदासि ।।४० ।।