कुलधर्म और परंपराएँ कैसे नष्ट होती हैं? | श्रीमद्भगवद्गीता Part 43
Bhagvad Gita
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कुलधर्म और परंपराएँ कैसे नष्ट होती हैं? | श्रीमद्भगवद्गीता Part 43
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गीता श्लोक 42 | कुलधर्म और परंपराएँ कैसे नष्ट होती हैं? | श्रीमद्भगवद्गीता Part 43
📝 Description
श्रीमद्भगवद्गीता — अध्याय 1 | श्लोक 42 | Part 43
पिछले भाग में अर्जुन ने कुल-परंपराओं और धर्म के कमजोर होने की चिंता व्यक्त की थी।
इस भाग में अर्जुन आगे बताते हैं कि उनके अनुसार ऐसी परिस्थितियों से परिवार और समाज की पुरानी धार्मिक परंपराएँ प्रभावित हो सकती हैं।
📖 गीता श्लोक 42:
“दोषैरेतैः कुलघ्नानां वर्णसङ्करकारकैः।
उत्साद्यन्ते जातिधर्माः कुलधर्माश्च शाश्वताः॥”
🙏 इस वीडियो में श्लोक का सरल हिंदी अर्थ और अर्जुन की चिंता को आसान भाषा में समझाया गया है।
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