ब्रह्मसूत्र ३
Shreevallbhacharya Vidhyapeeth
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ब्रह्मसूत्र ३
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📌 अध्याय-सूची / सारांश
॥ Conference Recording Ref 2823 ॥
🔷 सत्र का सार:
यह सत्र ब्रह्मसूत्राणुभाष्य के तृतीय पाद के तृतीय अधिकरण का विवेचन प्रस्तुत करता है। इस सत्र में अधिकरण के प्रथम तीन सूत्र— कार्याख्याना अपूर्वम (सूत्र १८), समान एवं च अभेदात (सूत्र १९), और संबंधात एव अन्यत्रपी (सूत्र २०)— पर विस्तृत चर्चा की गई है। मुख्य रूप से तैतरीय उपनिषद में वर्णित 'पुरुष अन्न रसमय' में पुरुष की पहचान और भगवान के आविर्भूत तथा आवेशित रूपों में भगवदीय गुणों के उपसंहार की स्थिति पर विचार किया गया है। यह स्पष्ट किया गया कि उपासना जीवगामिनी न होकर ब्रह्मगामिनी होती है, तथा आविर्भूत और अनाविर्भूत दोनों रूपों में ईश्वर के धर्म समान होते हैं।
0:05 सूत्र १८ (पाद ३, अधिकरण ३) — कार्याख्याना अपूर्वम सूत्र का विवेचन
28:46 सूत्र १९ (पाद ३, अधिकरण ३) — समान एवं च अभेदात सूत्र का विवेचन
39:49 सूत्र २० (पाद ३, अधिकरण ३) — संबंधात एव अन्यत्रपी सूत्र का विवेचन
▶ 0:05 — सूत्र १८ (पाद ३, अधिकरण ३) — कार्याख्याना अपूर्वम सूत्र का विवेचन
पाठ: ब्रह्मसूत्र ३/३/१८
प्रतिभागी वाचन:
वक्ता विवेचन:
*प्रकरण का परिचय:* तृतीय पाद के विषय का पुनरावर्तन करते हुए वक्ता ने तृतीय अधिकरण 'कार्याख्याना अपूर्वम' का प्रारंभ किया। पुरुषोत्तमजी के अधिकरण माला के निरूपण के अनुसार, यह छह सूत्रों का अधिकरण है। प्रथम वर्णक में व्यापक ब्रह्म की उपासना में आनंदमय कोष की आध्यात्मिक रूपता और फलदातृत्व का समर्थन किया गया है, तथा अन्नमयादि विभूतियों में चतुर्विध पुरुषों की आदि भौतिकता का निराकरण करके आध्यात्मिकता का समर्थन किया गया है। द्वितीय वर्णक में ब्रह्म में सभी गुणों का उपसंहार करने के लिए आविर्भूत न हुए पुरुषोत्तम विग्रह की आत्मरूपता बताते हुए ज्ञान-भक्ति मार्गीय फलावस्था और फलदातृत्व का साधारण वर्णन किया गया है।
*सूत्र का उपक्रम:* तैतरीय श्रुति में 'तस्मात्वास आत्म आकाश संभूतः' से उपक्रम करते हुए ब्रह्म से आकाश की उत्पत्ति बताई गई है, और फिर पंचमहाभूत सृष्टि का वर्णन है, जिससे पृथ्वी, औषधियाँ, अन्न और अंत में पुरुष अन्न रसमय होता है। इस 'पुरुष' की ब्रह्मरूपता पर संशय उत्पन्न होता है।
*संशय:* श्रुतियों में अन्न की ब्रह्मरूपता का वर्णन अन्यत्र भी प्राप्त होता है (जैसे भृगु वरुण संवाद में अन्न को ब्रह्म जानने को कहा गया है)। अतः यह संशय उत्पन्न होता है कि 'तवा एष पुरुषोन्नरसमय' में पूर्वोक्त पुरुष का ही उल्लेख है, या इससे भिन्न का? अर्थात्, ब्रह्म को ही पुरुष रूप से कहा जा रहा है या जीवात्मा को? पूर्वपक्षी मानता है कि यह जीवात्मा को अन्नमय कहा जाता है।
*पूर्वपक्षी का मत:* पूर्वपक्षी का मत है कि 'सवा एष' वाक्य पूर्व वस्तु की प्रत्यापत्ति करता है, अर्थात् ब्रह्म को ही। लेकिन 'अन्नात् पुरुषः' वाक्य में पुरुष का आदिभौतिक रूप से निरूपण किया गया है, जबकि 'सवा एष पुरुषोन्नरसमय' में आध्यात्मिक तत्व की बात है, इसलिए दोनों को अलग समझना चाहिए। संशय की निवृत्ति के लिए 'सवा एष' कहकर निश्चयात्मक रूप से पुरुष की पुष्टि की गई है, जिसका तात्पर्य है कि आध्यात्मिक रूप से जिसका उल्लेख है, वही प्रसिद्ध पुरुष अन्न रसमय है। यदि ऐसा अर्थ स्वीकार न किया जाए, तो श्रुति छल करती है। प्रकरण के अंत में आनंदमय का उल्लेख भी इसी बात की पुष्टि करता है कि आदिदैविक आनंदमय ब्रह्म ही पूर्व का आत्मा है, न कि कोई आदिभौतिक तत्व। शंकराचार्यजी पूर्वपक्ष में इसे जीवात्मा के रूप में देखते हैं, जो हमें अपनी जीवात्मा से संबंधित होने के कारण प्रिय लगता है।
*प्रश्न:* कार्याख्यान अपूर्वम सूत्र का क्या तात्पर्य है?
*उत्तर:* वक्ता ने स्पष्ट किया कि सूत्र का अर्थ यह है कि पहले जो कार्य का आख्यान हुआ, वह सामान्य आदिभौतिक कार्य नहीं है, बल्कि उससे अपूर्व, अर्थात् आदिदैविक ब्रह्म का ही निरूपण है। पूर्वपक्षी की 'जीवात्मा ही आदिदैविक आनंदमय है' वाली धारणा का यहाँ निराकरण किया गया है। शंकराचार्यजी का पूर्वपक्ष यही है कि जीवात्मा और परमात्मा दोनों एक हैं, इसलिए आत्मोपासना एक ही उपासना है।
▶ 28:46 — सूत्र १९ (पाद ३, अधिकरण ३) — समान एवं च अभेदात सूत्र का विवेचन
पाठ: ब्रह्मसूत्र ३/३/१९
प्रतिभागी वाचन:
वक्ता विवेचन:
*सूत्र का परिचय:* वक्ता ने द्वितीय सूत्र 'आविर्भूतस्य श्रीकृष्ण आदि रूपस्य आत्मत्वमेव' और 'समान एवं च अभेदात' पर चर्चा प्रारंभ की। इस सूत्र में 'च' शब्द का प्रयोग 'अपि' अर्थ में किया गया है, जिसका तात्पर्य है कि नेत्र, श्रोत्र आदि की विलक्षणता होते हुए भी वे सब समान रूप से एक हैं, विषम नहीं, क्योंकि उनमें ब्रह्मत्वेन एकता है। भगवान के अनेक नेत्र, अनेक कर्ण इत्यादि पुरुष सूक्त में वर्णित हैं, जो उनकी समरूपता को सिद्ध करते हैं।
*ब्रह्म का स्वरूप:* 'तम तु औपनिषदम पुरुषमं प्रच्छ्यामि' श्रुति से यह निश्चित होता है कि ब्रह्म स्वरूप केवल उपनिषद से ही वेद्य है। 'प्राण्यव प्राणो भवती' इत्यादि से यह निर्देश किया गया है कि प्रत्येक इंद्रिय ग्राह्य अर्थों को स्वरूपानुसार ही ग्रहण करना चाहिए, और उन सभी नामों से ब्रह्म का ही बोध होता है। यह पुत्र से भी अधिक प्रिय है, इत्यादि वाक्य सहज स्नेही लोगों की व्यवहार्यता को बतलाते हैं, और यह प्रियता आविर्भूत अवतार रूप में ही संभव है।
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