ब्रह्मसूत्राणुभाष्य-३/३/२१-२३
Shreevallbhacharya Vidhyapeeth
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ब्रह्मसूत्राणुभाष्य-३/३/२१-२३
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📌 अध्याय-सूची / सारांश
॥ ब्रह्मसूत्राणुभाष्य-३/३/२१-२३ ॥
🔷 सत्र का सार:
यह सत्र ब्रह्मसूत्राणुभाष्य के तृतीय पाद के तृतीय अधिकरण के सूत्रों २१, २२ और २३ पर आधारित है। सत्र में मुख्य रूप से ब्रह्म में गुणों के उपसंहार और अनुपसंहार के कारणों तथा भक्त हृदय में भगवान के स्वरूप के आवेश की विभिन्न अवस्थाओं पर विचार किया गया है। वक्ता ने समझाया कि फल की अवस्था में पहुँच चुके भक्तों को भगवद्धर्मों के उपसंहार की आवश्यकता नहीं रहती, जबकि साधना अवस्था में यह सहायक होता है। उन्होंने श्रीव्यासजी और मध्वाचार्यजी के मतों का भी संदर्भ दिया ताकि भगवदीय स्वरूप की अनुपमता और अद्वितीयता को स्थापित किया जा सके। `गुणोपसंहार` को साधना अवस्था के लिए आवश्यक माना गया, जहाँ गुणों की प्रतीति नहीं होती, जबकि फलावस्था में वे स्वानुभूत होते हैं।
0:00 पूर्व चर्चा का स्मरण
4:00 सूत्र २१ (नवा अविशेषार्थ) — अनुपसंहार में अवशेष का कारण
13:06 सूत्र २२ (दर्शयति च) — भक्तों के भक्त का संशय
25:53 सूत्र २३ (सम्या व्याप्य) — ब्रह्म की व्यापकता और अनुपसंहार
30:13 वक्ता विवेचन — चकार का प्रयोग और प्रतिस्पर्धा
38:52 प्रश्नोत्तर — उपसंहार की सत्यता
44:26 प्रश्नोत्तर — साधन अवस्था और फलावस्था
53:52 समापन
▶ 0:00 — पूर्व चर्चा का स्मरण
पाठ: पूर्व चर्चा
प्रतिभागी वाचन: गत सत्र में `कार्यना अधिकरण` पर विचार किया गया था, जहाँ आत्मा की उपासना का निरूपण परमात्मासन के रूप में करना स्वीकार किया गया। इस प्रकरण में आत्मा को इंद्रियवान और साकार कहा गया, जिससे ब्रह्म के अवयव होने या न होने का प्रश्न उठा। सूत्र १८ और १९ में यह कहा गया कि ब्रह्म के अवयव नहीं हो सकते और उनमें उच्च-नीच भाव भी नहीं होता। सूत्र २० में यह बात आई कि भगवान के आवेश के कारण कुछ उत्तम महापुरुषों में भगवद्धर्म दिखाई देते हैं। श्रीपुरुषोत्तमजी ने आज्ञा दी कि ऐसे आविष्ट जीवों में भगवद्धर्मों का उपसंहार करना चाहिए, क्योंकि यह जीवगत धर्मों का समन्वय न होकर भगवद्धर्मों का समन्वय होता है।
वक्ता विवेचन: वक्ता ने इस बात पर पुनः बल दिया कि आवेश होने पर भी भगवान के सभी गुणों का उपसंहार ज्ञानी भक्तों के लिए विचारणीय है, जैसे गुरु आदि में या आस्करन राजा के चरित्र में देखने को मिलता है।
▶ 4:00 — सूत्र २१ (नवा अविशेषार्थ) — अनुपसंहार में अवशेष का कारण
पाठ: ब्रह्मसूत्र ३.३.२१
प्रतिभागी वाचन: इस सूत्र का तात्पर्य है कि अनुपसंहार में अर्थात कब हमें भगवद्गुणों का उपसंहार उनमें नहीं करना चाहिए, इसका कारण `अविशेष` ही है। भगवान के भक्तों के जो भक्त होते हैं, वे भजन के रसास्वाद से आत्मविभोर होकर आनंदित रहते हैं। उन्हें भागवत्-धर्मों की भी अपेक्षा नहीं रहती, क्योंकि वे अब फलावस्था में होते हैं। अतः उनके हृदय में आविष्ट भगवत्-स्वरूप में भागवत्-धर्मों के उपसंहार की अपेक्षा नहीं रहती। भक्तों की उपासना में विशेष भाव ही महत्वपूर्ण है। `वा` शब्द अनुपसंहार की बाधा के अभाव का द्योतक है, अर्थात अनुपसंहार होना यह बताने के लिए `वा` शब्द का प्रयोग किया गया है। जब इतना उत्कट भाव प्रकट हो जाए, तब उन गुणों का समन्वय नहीं भी करें तो कोई खास प्रभाव नहीं पड़ता।
*नीरस शास्त्रविहित उपासना:* शास्त्रविहित गुणोपसंहारपूर्वक उपासना को नीरस कहा गया है। जब भक्त को भगवान का साक्षात् अनुभव होने लगता है, तब अन्य गुणों का चिंतन-मनन करना उन्हें अपेक्षित नहीं लगता, क्योंकि वह सब कुछ उन्हें बोरिंग लगने लगता है।
वक्ता विवेचन: वक्ता ने स्पष्ट किया कि यद्यपि गुणोपसंहारपूर्वक उपासना शास्त्रविहित है, किंतु वह नीरस होने के कारण अनादरणीय है। यह `वा` शब्द द्वारा ज्ञापन किया गया है। श्रीव्यासजी ने भी भक्तिमार्ग के स्मरण में प्रासंगिक गुणोपसंहार को महत्व नहीं दिया, क्योंकि वे स्वयं प्रभु के रसावेश से परवश थे। उपसंहार तो गुणों की सत्ता ज्ञान के लिए किया जाता है, परंतु रसोपासक भक्त के लिए तो उनका भजन ही उद्देश्य होता है।
▶ 13:06 — सूत्र २२ (दर्शयति च) — भक्तों के भक्त का संशय
पाठ: ब्रह्मसूत्र ३.३.२२
प्रतिभागी वाचन: यह सूत्र `दर्शयति च प्रायः` है। यहाँ एक संशय उपस्थित किया जा रहा है कि जो भक्तों के भक्त होते हैं (जैसे हम लोग ब्रजभक्तों के भावों से भावित भगवान का भावन करते हैं), वे अपने सेव्य भक्त की अलौकिक लीलाओं को देखकर उनमें आविष्ट भगवान में इंद्रादि आधिपत्य की अनुभूति करते हैं। वे `द्विलोक व्यापकत्व` आदि गुणों का उपसंहार करते हैं। यह `रागात्मिका भक्ति` (ब्रजभक्तों का भगवान के प्रति प्रेम) और `रागानुगा भक्ति` (उनका अनुगमन) के भेद को स्पष्ट करता है।
वक्ता विवेचन:
*प्रश्न:* प्रतिभागी ने पूछा कि `नवा अविशेषार्थ` में अनुपसंहार में अवशेष ही कारण है, तथा अनुपसंहार की बाधा के अभाव का द्योतक `वा` शब्द है, इसका क्या तात्पर्य है?
*उत्तर:* वक्ता ने समझाया कि `नवा अविशेषार्थ` का अर्थ है, अविशेष होने से अनुपसंहार करना है, अर्थात कुछ विशेष न रह जाने से। `अनुपसंहार की बाधा के अभाव का द्योतक` का अर्थ है कि अनुपसंहार में बाधा न होना, अर्थात अनुपसंहार होना। यह एक न्यायिक भाषा है जिसका अर्थ है कि नेगेटिव-नेगेटिव होकर पॉजिटिव हो जाता है।
*वक्ता का अतिरिक्त स्पष्टीकरण:* वक्ता ने बताया कि जब भक्त को भगवान का साक्षात् अनुभव होने लगता है और स्वयं भगवान अपने इंडिपेंडेंट गुणों को भक्त के सामने प्रकट करने लगते हैं, तब उन्हें भगवान के अन्यत्र निरूपित गुणों का समन्वय करने की आवश्यकता नहीं पड़ती। उपसंहार तब किया जाता है जब गुण अनुभूत नहीं होते; जब वे स्वानुभूत हो जाते हैं, तो आवश्यकता नहीं रहती। यह साधना अवस्था से फलावस्था में पहुँचने का भेद है। श्रीमहाप्रभुजी ने भी फलावस्था में `वांग मात्र में प्रमाण` कहा है।
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Recording date: October 21 2026 12:58:04 PM US/Eastern