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मन रूपी बगुले से परम हंस बनने की यात्रा 🦢 | बाहर से भीतर | हद से बेहद की अलौकिक यात्रा

सुर्य वन्शी नारायणी पाठ शाला

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मन रूपी बगुले से परम हंस बनने की यात्रा 🦢 | बाहर से भीतर | हद से बेहद की अलौकिक यात्रा

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सुर्य वन्शी नारायणी पाठ शाला
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हद से बेहद दृश्य से दृष्ट और कल्पना से अनुभूति की ओर बढ़ना है 🌀🌀🌀कौमन्टरी मन की बाहरी भटकन से भीतर के ज्ञान-सरोवर में उतरना और स्वयं की पहचान पाना है। इसलिए नाम में “हंस” के साथ परमहंस जोड़ना है। परम आत्मा का एक नाम परम हंस है 🌺 अलौकिक यात्रा — बाहर से भीतर, हद से बेहद की ओरचलना शुरु करना अगला पुरुषार्थ है!! मीठे बच्चे… मीठी आत्माओं… यह यात्रा है स्थल से सूक्ष्म की ओर जहां खड़े वहां से पीछे मुड़ना होगा मन आत्मा ने बाहर के सीन बहुत देख लिए अब भीतर के सूक्ष्म नजारे देखने है सूक्ष्म नगरी में प्रवेश करना है विष्णु नगर में प्रवेश करना है अब अलौकिक यात्रा आरम्भ करनी है— जिसमें पाँव कहीं नहीं जाते, पर चेतना अपने भीतर बहुत दूर तक उतरती चली जाती है। धीरे-धीरे बाहरी आवाज़ों से दूर हो जाओ… शरीर को सहज छोड़ दो… मन को भी किसी दृश्य के पीछे मत भेजो। चाँद नहीं देखना, तारों को नहीं देखना, आकाश लोक की सैर बहुत हो चुकी, अब अपने भीतर के मानसरोवर में उतरना है 🕊️ मन के आकाश से मन के मानसरोवर तक अब तक मन कभी जहाज़ बनकर, कभी उड़नखटोला बनकर, कभी रॉकेट बनकर चाँद-तारों के पार जाने की कल्पना करता रहा। वह यात्रा भी आवश्यक थी— वह बेसिक नॉलेज की यात्रा थी। उस नालिज ने हमें सीमित देह से उठाकर विशाल ब्रह्मांड का परिचय दिया। लेकिन अब… बैक गेयर लगाना है। आकाश से वापस पृथ्वी पर मन के भीतर ज्ञान सरोवर में लोट आना है। दृश्य से दृष्टा की ओर लौटना है। विचारों से मौन में उतरना है। अब अपने अन्तर्मन के मानसरोवर के किनारे बैठो। हंस बनो… 🦢 जल में उतरकर ज्ञान मोती चुगो। अर्थात् मुरली के प्रत्येक महावाक्य में से अपने जीवन का रत्न खोजो। जो शब्द भीतर जागृति पैदा करे—उसे रख लो। जो केवल दृश्य पैदा करे—उसे भी पार कर जाओ। क्योंकि अब— दृश्य नहीं चाहिए, अनुभूति चाहिए। कल्पना नहीं चाहिए, स्थिति चाहिए। यात्रा नहीं करनी, अवस्था बनानी है। 🌊 सागर के तल में उतरना अब चेतना को मन के सागर में धीरे-धीरे नीचे उतरने दो। ऊपर विचारों की लहरें हैं… नीचे शान्ति है। ऊपर स्मृतियाँ हैं… नीचे मौन है। ऊपर “मैं और मेरे” का बंधन है… नीचे केवल मैं—अविनाशी आत्मा की अनुभूति है। सागर के तट पर खड़े होकर सागर देखना अलग है, और सागर की गहराई में उतरना अलगबात है!! अब तट पर नहीं रहना—तल तक उतरना है। वहीं वह अमूल्य ज्ञान मोती मिलेगा जिसकी खोज में मां जन्मो जन्मो से भटकत रहा है!! जिसकी खोज कर रहा था वैसे ही थी खोजने वाला भी स्वंय ही थी अभी तक स्वंय को ही खोजा जा रहा था मुझमन को को अब स्मृति आई है कि मैं ही अपनी इस परमहंस*स्थिति को भूल गया था, जैसे-जैसे मुझे अपने परम स्वरूप परमहंस स्वरूप की स्मृति आती जा रही है वैसे-वैसे सामर्थ बनती जा रही हूं मैं आत्मा ही अजर अमर अविनाशी हूं परम हूं अपनी मास्टर भाग्य विधाता हूं 🌺 चैप्टर नाम मन रूपी बगुले से परमहंस बनने की यात्रा — हद से बेहद, दृश्य से दृष्टा और कल्पना से अनुभूति की ओर “बगुला” यहाँ उस मन का प्रतीक है जो बाहर के दृश्यों में खोजता रहता है, और “परमहंस” उस चेतना दिव्य बुद्धि का प्रतीक है जो मन के मान-सरोवर में उतरकर हंस की तरह मोती चुनती है। 🎬 थंबनेल अब बाहर नहीं… भीतर उतरना है! 🦢 बगुले से परमहंस बनने की यात्रा ज्ञान-सरोवर में मिलेगा कौन-सा रत्न? 🎥 YouTube टाइटल मन रूपी बगुले से परम हंस बनने की यात्रा 🦢 | बाहर से भीतर | हद से बेहद की अलौकिक यात्रा 📝 डिस्क्रिप्शन मीठे बच्चे… मीठी आत्माओं… 🌺 अब आँखों को बाहर के दृश्य दिखाने वाली यात्रा से आगे बढ़ना है। अब शुरू होती है अलौकिक यात्रा—बाहर से भीतर, हद से बेहद की ओर। पाँव कहीं नहीं जाते, लेकिन चेतना अपने भीतर बहुत दूर तक उतरती चली जाती है। चाँद-तारों और आकाश लोक की यात्रा बहुत हो चुकी… अब लौटना है अपने अन्तर्मन के मानसरोवर में। मन रूपी बगुला बाहर के दृश्यों में खोजता रहा, लेकिन परमहंस बनकर आत्मा ज्ञान-सरोवर में उतरती है और मुरली के प्रत्येक महावाक्य में से अपने जीवन का ज्ञान-मोती चुनती है। अब— दृश्य नहीं, अनुभूति चाहिए। कल्पना नहीं, स्थिति चाहिए। यात्रा नहीं, अवस्था बनानी है। सागर की सतह पर रहना नहीं… ज्ञान के सागर की गहराई में उतरना है। और उसी गहराई में एक अद्भुत स्मृति जागती है— जिसे मैं जन्मों से खोज रही थी, वह कोई बाहर की वस्तु नहीं थी… मैं स्वयं को ही भूल गई थी। मैं कौन हूँ? मैं अविनाशी आत्मा हूँ। मैं परमात्मा शिव की संतान हूँ। मैं अजर, अमर, अविनाशी आत्मा हूँ। और जैसे-जैसे अपने परम स्वरूप की स्मृति लौटती है, वैसे-वैसे भीतर की सच्ची समृद्धि प्रकट होती जाती है। 🌺 हद से बेहद की ओर… दृश्य से दृष्टा की ओर… भटकन से स्मृति की ओर… और बगुले से परमहंस बनने की ओर।