जब मन-बुद्धि आत्मा के आगे समर्पित होती है|
सुर्य वन्शी नारायणी पाठ शाला
0:00 / 0:00
जब मन-बुद्धि आत्मा के आगे समर्पित होती है|
28 просмотров · 13 дн. назад
सुर्य वन्शी नारायणी पाठ शाला
65 подписчиков
28 просмотров · 13 дн. назад
त्रिवेणी संगम का भाग अगला भाग अगला
जब मन और बुद्धि जब आत्मा के कहे अनुसार चलता है त्रिवेणी संगम कहा जाता है और यह कुंभ के अंदर मिलते हैं आपके घट में मिलन होता है उससे जो पराग निकलता है
इस मिलन से जो पराग निकलता है उसे प्रयागराज कहते हैं !!
जो पिंन्डे ब्रह्मांडे,, मन और बुद्धि आत्मा रानी के साथ बैठती है, उसी को सुनती है और उसी के अनुसार चलती है, तब भीतर की संगत बदल जाती है। नहीं तो पहले क्या हो रहा था
तू भी रानी मैं भी रानी कौन भरेगा पानी
आत्मा रानी थी और मन कहता रहा है कि मैं भी रानी हूं और बुद्धि रहती है मैं राजा हूं इन तीनों का संगम होता है दोनों अपना अपना कार्य विधि बध्द करते हैं
अमर कथा तीनों ने बैठकर सुनी थी
🌺 और तब समझ आता है गजराज का रहस्य
अखंड योग के बाद यह विषय गजराज और हथनी के विशाल मस्तक की ओर ले आता है।
यहाँ हाथी केवल पशु नहीं है—इस कथा के अंदर हाथी बुद्धि को शिव पिता की बुद्धि कहेंगे बेहद के ज्ञान की चर्चा हो रही है हद की दृष्टि हटाकर पढ़नी पड़ेगी, यह इशारों की भाषा है प्रतिकों की भाषा है सिंबॉलिक भाषा है यह इशारे देवी देवता ही पकड़ पाएंगे
विशालता, स्मृति, धैर्य और विराट बुद्धि का प्रतीक है।
मानो शिव-शक्ति आत्मा को वरदान देती है—
“अब तुम्हारी बुद्धि छोटी सीमाओं में नहीं अटकेगी,
व्यक्ति से विराट की ओर बढ़ना है।
हद से बेहद की ओर बढ़ना है।
क्षणिक से अविनाशी की ओर बढ़ो।”
इसीलिए गणेश को विशाल मस्तक दिया गया है।आत्मा के सत्य को दिखाया गया है आत्मा मास्टर विध्न विनाशक हैऔर विशाल सम्भावनाओं की मालिक है
छोटा सिर—सीमित सोच।
विशाल मस्तक—विशाल बुद्धि।
और यही अखंड योग की अगली प्राप्ति है—
देह से न्यारा होना वैराग्य है,
*अहंकार से न्यारा होना योग है,
साक्षी में स्थित होना शंकर अवस्था है,
और विशाल बुद्धि में स्थित होना गणेशत्व है।
💞 बेहद का सार
पार्वती ने देह-अभिमान का वस्त्र बाहर रखा।
गणेश ने विशाल बुद्धि का रहस्य जन्मा,।
शंकर ने त्रिशूल से अहंकार की तीन धाराएँ काटीं।
काली ने विकारों को योग-अग्नि में भस्म किया।
और आत्मा ने अपने मास्टर अविनाशी सत्य स्वरूप को पा लिया।
इसलिए इन झलकियों को इतिहास या बाहरी घटना समझकर मत रुको।
ये योग की भाषा है।
ये संकेतों की भाषा है।
ये भीतर घटने वाली यात्रा का चित्र है।
और इस पूरी यात्रा का एक ही मंत्र है—
**“देह को साधन समझो, आत्मा को मास्टर परमात्मा करके जानो सत्य जानो;
कर्तापन छोड़ो, साक्षी बनो;
एक को याद करो—और अन्ततः वही रह जाए।”**मास्टर अविनाशी सट्टा रह जायें
यही अखंड योग है।
यही स्वंय पर बेहद की विजय है। विजय मलिक की मणके बन सेवा करनी हो परमार्थ है!!