Battle of Ten Kings | दशराज्ञ युद्ध | Rigveda 7.18 - Vedic War Chant of Indra (Sanskrit + Hindi)
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Battle of Ten Kings | दशराज्ञ युद्ध | Rigveda 7.18 - Vedic War Chant of Indra (Sanskrit + Hindi)
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Battle of Ten Kings | दशराज्ञ युद्ध | Rigveda 7.18 - Vedic War Chant of Indra (Sanskrit + Hindi)
दशराज्ञ — सुदास का संग्राम ⚔️🔥
ऋग्वेद के सप्तम मण्डल के अष्टादश सूक्त (ऋग्वेद 7.18) से प्रेरित यह वैदिक युद्ध-गाथा राजा सुदास, परुष्णी नदी और दशराज्ञ संघर्ष की स्मृति को एक गंभीर, शक्तिशाली वैदिक चैंट के रूप में प्रस्तुत करती है।
आरम्भ में शांत और गंभीर वैदिक स्वर, और धीरे-धीरे बढ़ता हुआ रण-उत्साह — अंत में वज्रधारी इन्द्र की गर्जना के साथ चरमोत्कर्ष।
यह प्रस्तुति मूल ऋग्वैदिक मंत्रों और उनसे प्रेरित हिन्दी काव्यात्मक भावार्थ का रचनात्मक संयोजन है।
Lyrics
ॐ अग्ने...
ॐ इन्द्राय नमः...
परुष्णी की धाराएँ गरज उठीं,
दस राजाओं की सेनाएँ उमड़ पड़ीं।
एक ओर सुदास खड़ा था,
दूसरी ओर राजाओं का महासंघ।
त्वे ह यत्पितरश्चिन्न इन्द्र
विश्वा वामा जरितारो असन्वन् ।
त्वे गावः सुदुघास्त्वे ह्यश्वाः
त्वं वसु देवयते वनिष्ठः ॥
हे इन्द्र! तुम्हीं में पुरखों का बल,
तुम ही धन के दाता हमारे।
इन्द्र! इन्द्र! वज्र उठाओ,
सुदास का तुम साथ निभाओ।
राजेव हि जनिभिः क्षेष्येव
आव द्युभिरभि विदुष्कविः सन् ।
पिशा गिरो मघवन् गोभिरश्वैः
त्वायतो शिशीहि राये अस्मान् ॥
हे मघवन! हमारी वाणी सुनो,
अंधकार में सूर्य बनो।
दस दिशाओं से शत्रु आए,
फिर भी तृत्सु पीछे न जाए।
धेनुं न त्वा सूयवसे दुदुक्षन्
उप ब्रह्माणि ससृजे वसिष्ठः ।
त्वामिन्मे गोपतिं विश्व आहा
न इन्द्रः सुमतिं गन्त्वच्छ ॥
तुम ही गोपाल, तुम ही रक्षक,
हम पर बरसे कृपा अक्षय।
परुष्णी गरजे, धरती काँपे,
शत्रु-संघ आज रण में हारे।
अर्णांसि चित्पप्रथाना सुदास
इन्द्रो गाधान्यकृणोत्सुपारा ।
शर्धन्तं शिम्युमुचथस्य नव्यः
शापं सिन्धूनामकृणोदशस्तीः ॥
उफनती धाराएँ राह रोकतीं,
पर इन्द्र उन्हें भी पार कराते।
सुदास के रथ आगे बढ़े,
शत्रुओं के गर्व सभी टूटे।
पुरोळा इत् तुर्वशो यक्षुरासीत्
राये मत्स्यासो निशिता अपीव ।
श्रुष्टिं चक्रुर्भृगवो द्रुह्यवश्च
सखा सखायमतरद्विषूचोः ॥
तुरवश आए, मत्स्य भी आए,
द्रुह्यु-भृगु रण में छाए।
चारों ओर से शत्रु उमड़े,
सुदास के सम्मुख दल थे जुड़े।
आ पक्थासो भलानसो भनन्त
आलिनासो विषाणिनः शिवासः ।
गव्या तृत्सुभ्यो अजगन्युधा नॄन् ॥
दस दिशाओं से गर्जन आया,
वज्रधारी इन्द्र मुस्काया।
एक तरफ राजाओं के दल,
दूसरी ओर सुदास का बल!
वज्र! वज्र! वज्रधारी!
इन्द्र बना रण का प्रहरी!
सुदास का ध्वज ऊँचा रहे,
तृत्सु का यश अमर रहे!
नि गव्यवोऽनवो द्रुह्यवश्च
षष्टिः शता सुषुपुः षट् सहस्रा ।
षष्टिर्वीरासो अधि षड्दुवोयु
विश्वेदिन्द्रस्य वीर्या कृतानि ॥
अनेक योद्धा रण में सोए,
कितने वीर धरती में खोए।
इन्द्र के वज्र से रण हिला,
शत्रु का सारा बल मिटा।
शश्वन्तो हि शत्रवो रारधुष्टे
भेदस्य चिच्छर्धतो विन्द रन्धिम् ।
मर्ताँ एनः स्तुवतो यः कृणोति
तिग्मं तस्मिन्नि जहि वज्रमिन्द्र ॥
हे इन्द्र! उन पर वज्र गिराओ,
अधर्म का अभिमान मिटाओ!
वज्र उठा! वज्र उठा!
आकाश में गर्जा इन्द्र!
सुदास खड़ा, ध्वज ऊँचा,
टूट पड़ा शत्रु-संघ समूचा!
आवदिन्द्रं यमुना तृत्सवश्च
प्रात्र भेदं सर्वतातामुषायत् ।
अजासश्च शिग्रवो यक्षवश्च
बलिं शीर्षाणि जभ्रुरश्व्यानि ॥
यमुना के तट तक पहुँची पुकार,
तृत्सुओं के संग इन्द्र अपार।
शत्रु के दल सब झुक गए,
वज्र के आगे रुक गए।
इमं नरो मरुतः सश्चतानु
दिवोदासं न पितरं सुदासः ।
अविष्टना पैजवनस्य केतं
दूणाशं क्षत्रमजरं दुवोयु ॥
हे मरुतो! सुदास के संग चलो,
उसकी विजय के रक्षक बनो।
पैजवन का यह तेज अमर रहे,
उसका राज्य सदा प्रखर रहे।
इन्द्र! इन्द्र! वज्र उठाओ,
सुदास का ध्वज नभ में लहराओ।
परुष्णी आज गवाही दे,
सुदास का यश अमर रहे।
ॐ इन्द्राय नमः।
ॐ इन्द्राय नमः।
ॐ इन्द्राय नमः।