तीज गीत | रचना - डॉ राम नारायण तिवारी 'भदवरिया' | स्वर - डॉ दुर्गेश उपाध्याय | तबला - गुरु दयाल
भोजपुरी के साधक - Durgesh Upadhyay
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तीज गीत | रचना - डॉ राम नारायण तिवारी 'भदवरिया' | स्वर - डॉ दुर्गेश उपाध्याय | तबला - गुरु दयाल
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तीज गीत — डॉ. रामनारायण तिवारी
जवना बने सिंकियो ना ससरेला, बाघिनी गुजेरेलि हो राम।
ए राम! ओही बने गउरा तप ठानेली, शिव बर माँगे ली हो राम।
ई पंक्तियन में गौरा के कठिन वन-जीवन आ शिव के पति रूप में पावे के संकल्प के चित्रण बा। हरितालिका तीज में गौरा के तपस्या आ अडिग इच्छा के विशेष महत्व मानल जाला।
तपत तपत गउरा तपली, बदन तपि गलि गइली हो राम।
ए रामा! तबहूँ ना पसीजेला जोगिया, तपावे दिन-रतिया हो राम।
गौरा दिन-रात कठोर तप करेली। शरीर क्षीण हो गइल, बाकिर शिव के पावे के उनकर संकल्प ना टूटल। ई अंश तप, धैर्य आ समर्पण के भाव प्रकट करेला।
लाख समझावे बनसपती, निहोरा कई मनावेले हो राम।
ए गउरा छोड़ अड़भंगिया के आस मनावऽ देव दोसर हो राम।
गौरा के समझावल जाला कि शिव के आस छोड़ के दोसरा वर के स्वीकार कर लीं, बाकिर गौरा अपना मन के बात पर अडिग रहेली। ई उनकर अटूट निष्ठा के प्रतीक ह।
बतिया ना मानें देवि गउरा, उलटी के जवाब देली हो राम।
ए माता! सातो जन्म के बन्धनवा, कइसे के हम तेयागी हो राम।
ए माता! भले मोरा छूटि जइहें प्राण, शिवहि बर चाहिला हो।
एह पद में गौरा अपना संकल्प के स्पष्ट करेली—शिव के छोड़ के दोसरा के वर मानल उनका खातिर संभव नइखे। “सातो जन्म के बन्धनवा” आ “शिवहि बर चाहिला” में जन्म-जन्मांतर के दांपत्य आ अटूट प्रेम के लोकभावना देखाई देला।
बन से निकलली बनऽ सपती चलेली कैलास पो हो राम।
ए रामा! जहाँ बसेले अड़भंगिया, रमावे धुनि आपन हो।
गौरा कठिन वन-पथ से शिव के खोज में आगे बढ़ेली। शिव के योगी आ विरक्त स्वरूप के “अड़भंगिया” कह के लोकभाषा में चित्रित कइल गइल बा।
माता के देखि शिव पूछेलें जंगल अमंगल हो राम।
ए रामा! कवन भिहिलइली, काहे तू अइलू परवत हो राम।
शिव गौरा के कठिन अवस्था में देख के उनका से वन में अइला के कारण पूछेलन। एह अंश में शिव-गौरा के संवाद आ कथा के भावात्मक मोड़ सामने आवेला।
नाहीं मोर अन धन थोर भइलें, बनऽ रूख बिछुन भइलें हो राम।
ए सिव! राजा दक्ष के आल्हर धियनियाँ तोहके गोहरावली हो राम।
गौरा वन में अपना कठिन परिस्थिति के वर्णन करेली आ शिव के पुकारेली। “राजा दक्ष” के उल्लेख शिव-संबंधित लोककथात्मक परंपरन के ओर संकेत करेला।
नहीं गौरा खालीं दाना पानी ना संसियो में साँस लेली हो राम।
ए सिव! लागत बा कि तेजहीं ऊ जान जंगल में अमंगल हो राम।
अन्न-पानी के अभाव आ कठिन तपस्या से गौरा के शरीर अत्यंत कमजोर हो गइल बा। एह पंक्तियन में तपस्या के चरम कठिनाई आ त्याग के भाव व्यक्त भइल बा।
अतना बचन सिव सुनले, सुनही नाहीं पावेले हो राम।
ए राम! बसहां भइलें असवार जंगल के पयान कईलें हो राम।
शिव गौरा के बात सुन के नंदी अर्थात बसहा पर सवार होके आगे बढ़ेलन। ई प्रसंग शिव के योगी-वैरागी स्वरूप के लोकगीत के माध्यम से प्रस्तुत करेला।
भादो अंजोरिया के तिजिया, सोहाग सती पावेली हो राम।
ए रामा! जुग जुग होई एहबात, जे तिथि तीज ठानि हो राम।
अंतिम पद में गीत सीधे हरितालिका तीज से जुड़ जाला। भादो के तीज, सुहाग आ जुग-जुग के दांपत्य-सौभाग्य के मंगलकामना एह गीत के मूल भाव बन जाला। डॉ. रामनारायण तिवारी के ई भोजपुरी लोकगीत गौरा के तप, त्याग, शिव के प्रति अटूट समर्पण आ तीज के सौभाग्य-परंपरा के बहुत सहज आ भावपूर्ण ढंग से प्रस्तुत करेला।